धार। बस ड्राइवर की मदद से नवजात की जिंदगी बच गई। रविवार दोपहर प्रसूता को दर्द ज्यादा होने पर ड्राइवर ने 27 किमी का रास्ता मात्र 20 मिनट में तय कर उसे जिला अस्पताल पहुंचा दिया।

अस्पताल स्टाफ ने बस में ही प्रसूति करवाई। प्री-मैच्योर होने से बच्चे को एसएनसीयू में भर्ती करवाया गया है, जहां वह जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि अगर रास्ते में ही प्रसूति हो जाती तो बच्चे का बचना मुश्किल था। मां की हालत ठीक है, वह भी वार्ड में भर्ती है।

प्रसूता पति के साथ इंदौर से धार के लिए निजी बस में बैठी थी। पति विनोद ने बताया कि वे मांडू के रहने वाले हैं। इंदौर में जवाहर टेकरी पर ईंट के भट्टे पर काम करते हैं। पांच दिन की छुट्टी लेकर मांडू होली मनाने जा रहे थे। पत्नी रविता को सातवां महीना चल रहा था, इसलिए कोई डर नहीं था, लेकिन लेबड़ पहुंचने पर ज्यादा दर्द शुरू हो गया।

पति और पास बैठी महिलाओं ने ड्राइवर रहीस खान को यह जानकारी दी, फिर सभी ने यह तय किया तो बस सीधे अस्पताल में लेकर चलें। इस पर ड्राइवर लाइट जलाते हुए तेजी से बस लेकर सीधे जिला अस्पताल पहुंच गया। बस में सवारियां भी बैठी थीं सभी ने भी कहा कि हमें बाद में छोड़ देना।

अस्पताल परिसर में सभी ने मदद की और स्टाफ को बुलाया। स्टाफ नर्स ने बस में ही प्रसूति करवाई। बच्चा कमजोर था तो उसे एसएनसीयू में भर्ती किया। सामन्य तौर पर लेबड़ से धार का बस से 35 से 40 मिनट तक समय लगता है। ड्राइवर खान ने बताया कि जानकारी मिलने पर महिला को बस में व्यवस्थित सीट पर बिठाया था। लेबड़ से बस लेकर सीधा जिला अस्पताल लेकर पहुंचा। यह तो हमारा फर्ज है।

देरी होती तो जा सकती थी जान

बच्चा प्री-मैच्योर है। वजन 945 ग्राम है। सांस लेने में दिक्कत और धड़कन कम थी। इलाज के बाद स्थिति बेहतर हुई है, लेकिन अभी भी नाजुक है। बच्चा समय से पहले जन्मा है। अगर रास्ते में ही प्रसूति होती तो उसकी जान भी जा सकती थी। -डॉ. एमके बर्मन, एसएनसीयू इंचार्ज