छतरपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

पारंपरिक खेती में अलग-अलग कारणों से नुकसान उठाकर परेशान

कि सानों ने अब वैकल्पिक उपायों को अपनाना शुरू कर दिया है। इसी क्रम में एक समय पारंपरिक खेती करके परिवार का गुजारा करने वाले बाबूराम अब मधुमक्खी पालन को अपना रहे हैं। जिससे एक साल में वे करीब ढाई लाख रुपए की कमाई कर लेते हैं वो भी कि सी जोखिम के । उनका यह नया काम अन्य कि सानों के लिए आकर्षण का केंद्र बना है।

छतरपुर में देरी रोड पर रहने वाले बाबूराम प्रजापति पुत्र भूरा प्रसाद प्रजापति उम्र 50 वर्ष पहले पारंपरिक खेती पर निर्भर थे। खरीफ और रबी चक्र में कभी अल्पवर्षा, कभी अतिवृष्टि, कभी सूखा तो कभी ओलावृष्टि से फसल को नुकसान होने से उन्होंने आजीविका चलाने के लिए एक निजी स्कू ल में शिक्षक की नौकरी कर ली। उसमें भी तनख्वाह कम होने से गुजारे में अड़चन आने लगी। बाबूराम प्रजापति बताते हैं कि परेशानी के दौर में कृषि विज्ञान केंद्र के तकनीकि विशेषज्ञों के संपर्क में आने से मधुमक्खी पालन के बारे में जानकारी मिली। पहले 4 बाक्स में मक्खी पालन शुरू कि या जिसमें लाभ हुआ। वर्तमान में करीब 80 बाक्स में मक्खी पालन कर रहे हैं। 6000 रुपए कीमत वाला एक बाक्स के हिसाब से 80 बाक्सों में मधुमक्खी पालकर एक साल में करीब 25 क्विंटल शहद तैयार करके उसे कानपुर के एक व्यापारी को 100 से 125 रुपए प्रति कि लो के हिसाब से बेचते हैं। इससे साल में करीब ढाई लाख रुपए का फायदा हो जाता है। बाबूराम का कहना है कि पारंपरिक खेती के साथ वैकल्पिक साधन के रुप में मधुमक्खी पालन से उन्हें आजीविका चलाने में काफी मदद मिली है। एक साल में 4 से 5 बार शहद का उत्पादन लेकर बाबूराम की जिंदगी की गाड़ी तेजी से दौड़ने लगी है। यदि कहा जाए कि बाबूराम के जीवन में मधुमक्खी पालन ने मिठास घोल दी है तो अतिश्योक्ति न होगी। यहां बता दें कि बाबूराम पिछले करीब 6 साल से मधुमक्खी पालन से जुड़े हैं और अनुभव को विभागीय प्रशिक्षणों में मास्टर ट्रेनर के रुप में अन्य कि सानों को बांट भी रहे हैं।

तीन माह में शहद से भर जाते हैं बाक्स

मधुमक्खी पालन को आय का अच्छा जरिया और पारंपरिक खेती का आसान विकल्प बताते हुए सहायक संचालक कृषि डॉ. बीपी सूत्रकार का कहना है कि मधुमक्खी पालन में जरा सी सावधानी और अच्छा मुनाफा कि सानों को इस ओर आकर्षित कर रहा है। इलाहाबाद और मुरैना से मुधमक्खी सहित इसे पालने के बाक्स 6 हजार रुपए प्रति बाक्स के हिसाब से मिल जाते हैं। मधुमक्खी जहां पाली जाती है उसके आसपास 5 कि मी के दायरे से मधुक्खियां मधु एकत्र करके इन बाक्स में जमा करती हैं। इसमें सावधानी की बात है कि इन बाक्सों को चिड़ियों से बचाना जरूरी है और रात में ही इन बाक्सों को खोला जाए। इस तरह से तीन माह में एक बाक्स शहद तैयार हो जाती है। जितने अधिक बाक्स में मधुमक्खी पाली जाएं उसी के अनुसार उत्पादन होता है। उन्होंने बताया कि फ्रेश शहद कानपुर और लखनऊ के बाजार में 250 से 300 रुपए प्रति कि लो और कच्ची शहद 100 से 125 रुपए प्रति कि लो के हिसाब से बिकती है। कच्ची शहद में 20 प्रतिशत कचरा निकल जाता है कु ल मिलाकर मधुमक्खी पालन कि सानों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है, इसलिए कई कि सान इसे अपनाने लगे हैं।

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नोट- समाचार के साथ फोटो 24 एवं 25 लगाएं। के प्सन है-

छतरपुर। मधुमक्खी पालन के बाक्स दिखाते कि सान बाबूराम। -24

छतरपुर। मधुमक्खी पालन के लिए मैदान में रखे गए बाक्स। -25

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