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    आदिवासी समाज में शादियों की धूम चांदी के दाम गिरने से चेहरे चमके

    Published: Sat, 22 Apr 2017 03:58 AM (IST) | Updated: Sat, 22 Apr 2017 03:58 AM (IST)
    By: Editorial Team

    दोपहर में विवाह गीतों की गूंज, कपड़ों की दुकानों पर भीड़, सामग्री की खरीदारी में भाग ले रहे पूरे गांव के लोग

    डही। नईदुनिया न्यूज

    क्षेत्र के आदिवासी समाज में शादी समारोह चरम पर हैं। गांव-गांव में मांदल की थाप और विवाह गीतों की गूंज सुनाई देने लगी है। दोपहर में अब बाजार भी गुलजार होने लगे हैं। व्यापार-व्यवसाय में रौनक आ गई है। डही के बाजार में गीत गाती युवतियां जब सिर पर बोहलनी लेकर खरीदी करने आती हैं, तो बाजारों में रौनक सी छा जाती है। डही के बाजार में क्षेत्र के 62 गांव के आदिवासी, जिनके यहां शादियां होनी हैं, उनके द्वारा खरीदी का सिलसिला शुरू हो गया है।

    बेमिसाल परंपरा, सादगी और आत्मीयता का पुट लिए इस समाज की शादियों में तो पूरा गांव शामिल होता ही है। खास बात यह है कि कपड़े, गहने और अन्य सामान की खरीदारी में भी वर या वधू पक्ष के साथ पूरे गांव के लोग शामिल हो रहे हैं और वह भी सामूहिक खर्च की परंपरा निभा रहे हैं। यानी गांव के लोग खरीदारी के दौरान वर-वधू पक्ष के साथ खाने-पीने का खर्च मिल-बांटकर उठाते हैं। इस भाईचारे की परंपरा का निर्वाह इन दिनों में बाजारों में दिख रहा है। आदिवासी इन दिनों फुर्सत में हो गए हैं, इसलिए पूरे सुकून के साथ वर-वधू को खरीदारी कराने उनके साथ डही आ रहे हैं।

    क्यों आते हैं साथ

    आधुनिकता के बावजूद बरसों से खरीदारी में पूरे गांव के साथ आने की परंपरा आज भी कायम है। हालांकि अभी शुरुआती दौर है। मई तक शादियों की धूम शबाब पर रहेगी। वर या वधू की खरीदारी में साथ आने की परंपरा बारेला में ज्यादा है। वर या वधू पक्ष खरीदारी में ठगा नहीं जाए, एक यह कारण भी होता है गांव के लोगों द्वारा साथ में आने का। दूसरा कारण यह कि गांव में किसी घर में शादी का आयोजन हो तो पूरा गांव इस खुशी में उत्साहित हो जाता है।

    विवाह समारोह का प्रतीक होती है बोहलनी

    ग्राम टेमरिया के भंगड़ा अलावा ने बताया कि आकर्षक बोहलनी विवाह समारोह का प्रतीक है। मैं अपने पुत्र की शादी के लिए डही से चमक वाली कली, उसके ऊपर नकली रंग-बिरंगे फूल व आसपास छोटे गोल कांच की कारीगरी से युक्त बोहलनी 500 रुपए में खरीदकर लाया हूं। इसके अलावा और भी महंगी बोहलनी एक हजार रुपए तक मिलती है। हमारे यहां विवाह के बाद अगर परिवार में और शादी आती है तो यह बोहलनी हम उन्हें दे देते हैं।

    लुगड़ा-घाघरा कपड़ों की खूब खरीदी

    समाज में दुल्हन को लुगड़ा-घाघरा पहनाने की परंपरा है। यह महिलाओं और युवतियों का परंपरागत पहनावा भी है। इसके चलते लुगड़ा-घाघरा के कपड़ों की खूब खरीदी हो रही है। कपड़ों की दुकान पर दुल्हन सहित दूल्हे के वस्त्रों की खरीददारी करने आदिवासी झुंड में गांव वालों के साथ आ रहे हैं।

    चांदी के गहने देने का रिवाज

    आदिवासी समाज में वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को चांदी के गहने देने की रिवाज है। शादी ब्याह के सीजन में चांदी का भाव कम हो जाने से आदिवासी खुश हैं। दूल्हे की बहनें अपनी नई नवेली भाभी के लिए गांव के लोगों के साथ चांदी खरीद रही हैं। सराफा व्यवसायी महेंद्र सोनी ने बताया कि अभी चांदी का भाव 36 हजार रुपए प्रति किलो है, जबकि गत वर्ष चांदी का भाव 43 हजार रुपए प्रति किलो था। शादियों के चलते चांदी का धंधा जोर पकड़ने लगा है।

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