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    यहां एक ही छलनी में हैं दो शिवलिंग, रोचक कहानी जुड़ी है 500 साल पुराने इस मंदिर की

    Published: Tue, 13 Feb 2018 10:53 PM (IST) | Updated: Wed, 14 Feb 2018 04:49 PM (IST)
    By: Editorial Team
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    इंदरगढ़ (अनूप सिंह जाट)। इंदरगढ़ नगर से मात्र दो किमी दूरी पर ग्राम दोहर का नाम किसी राजा या व्यक्ति ने नहीं रखा। बल्कि भगवान भोलेनाथ की कृपा से गांव नाम दोहर रखा गया। गांव के शंकर मंदिर में एक ही जलनी में दो शिवलिंग एक साथ जुड़े हुए हैं। जिससे गांव का नाम दोहर पड़ा। मंदिर कितना पुराना है। इसके बारे में किसी को नहीं पता। गांव के बुर्जुगों का कहना है कि मंदिर की स्थापना लगभग 500 साल पहले की है। जिसके बारे में किसी व्यक्ति को ज्यादा नहीं पता। गांव के निवासी लखन गुप्ता का कहना है कि मंदिर की गिनती प्राचीन मंदिरों में की जाती है। एक जलनी में दो शिवलिंगों की स्थापना वाला मंदिर पूरे जिले भर में कही भी नहीं है।

    क्या है मंदिर की कहानी

    लगभग 400 साल पूर्व कारसदेव महाराज की बहन अहलादी देवी इस प्राचीन दो हर मंदिर में प्रतिदिन पूजा करने आती थी। एक दिन दो हर मंदिर पर अहलादी देवी पूजा करने जा रही थी। तभी इंदरगढ़ के राजा इंद्रजीत सिंह हाथी पर सवार होकर वहां से गुजर रहे थे। राजा इंद्रजीत के सैनिकों ने उनको दुत्कारा और दूर हटने का आदेश देते कहा कि मार्ग से हट जाओ वर्ना हाथी तुम्हें कुचल देगा। नाराज अहलादी देवी ने हाथी की जंजीर अपने बांये पैर के अंगूठे से दबा ली और कहा कि अब देखते हैं कि तुम्हारा हाथी आगे कैसे बढ़ता है। तमाम प्रयास के बाद भी हाथी आगे नहीं बढ़ सका। तब राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने माता से क्षमा मांगी। तब हाथी आगे बढ़ सका।

    अहलादी देवी पर राजा इंद्रजीत मोहित हो गये। अपने दरबरियों के सामने अपनी इच्छा जाहिर की। अहलादी देवी को जब इस बात की जानकारी लगी तो उन्होंने इंदरगढ़ छोड़ दिया और कारसदेव के पास राजस्थान के जहाज झांझ चली गई। जहाज में अहलादी देवी के नहरने उपरांत केश फटकारने से शिलाओं पर पड़े निशान आज भी दिखते है।

    घूमता था एक शिवलिंग

    ग्रामीण हरदास परिहार ने बताया कि मंदिर के दो शिवलिंगों में से एक शिवलिंग थोड़ा सा चपटे से आकार का है। जो पहले प्रतिवर्ष धीरे धीरे घूमता था। इसके आकार को देखकर पता चल जाता था। लेकिन कुछ समय पूर्व मंदिर का जीर्णोद्वार के दौरान इन शिवलिंगों के आस पास कांक्रीट भर दिया गया। तब से यह शिवलिंग स्थिर हो गए हैं। प्राकृतिक रूप से घूमने वाले इस शिवलिंग के साथ जीर्णोद्वार के दौरान छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए थी। मंदिर के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आते है। मंदिर में जो भी भक्त सच्चे मन से भोलेनाथ की आराधना करता है। उसकी हर मनोकामना पूरी होती है। शिवरात्रि में यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।

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