ईश्वरसिंह परमार / आदर्श ठाकुर, देवास। विधानसभा चुनाव में आठ में से चार सीटें हारने के बाद भाजपा के लिए अपना गढ़ यानी देवास लोकसभा सीट बचाना आसान नहीं है। बीता चुनाव भाजपा ढाई लाख वोटों से जीती थी। तब राजनीतिक समीकरण अलग थे।

चुनाव से पांच महीने पहले ही 2013 में मप्र विधानसभा हुए थे और भाजपा ने न सिर्फ सभी आठों सीटों पर कब्जा जमाया था बल्कि उसे वोट बैंक में भी फायदा पहुंचा था लेकि न इस बार हालात जुदा हैं। भाजपा के पास आठ में से चार सीटें ही हैं। जिन चार सीटों पर भाजपा जीती, वहां भी उसका वोट बैंक कम हो गया है।

1951 से 2014 तक हुए चुनावों में कई बार भाजपा रिकॉर्ड वोटों से जीती। यहां से कांग्रेस 1951, 1957, 2009 समेत चार बार ही जीत पाई। वर्ष 1971 से 2004 तक भाजपा ने लगातार 10 चुनाव जीते। सबसे ज्यादा बार जीतने का रिकॉर्ड जनसंघ व भाजपा के फूलचंद्र वर्मा के नाम रहा। जिन्होंने लगातार पांच बार जीत हासिल की, जबकि मौजूदा केंद्रीय मंत्री थावरचंद गेहलोत 1996 से 2004 तक चार चुनाव जीते। गेहलोत की जीत का सिलसिला 2009 में कांग्रेस के सज्जनसिंह वर्मा ने तोड़ा। 2014 में भाजपा ने फिर सीट पर कब्जा जमाया और मनोहर ऊंटवाल ढाई लाख वोटों से जीते थे।

सीटों पर मिलेगी चुनौती

शाजापुर, देवास, सीहोर व आगर जिले की आठ सीटें देवास संसदीय क्षेत्र में शामिल हैं। इनमें शाजापुर जिले की शाजापुर, शुजालपुर व कालापीपल, देवास जिले की देवास, सोनकच्छ व हाटपीपल्या, आगर जिले की आगर एवं सीहोर जिले की आष्टा विधानसभा शामिल हैं। इसमें देवास, शुजालपुर, आगर, आष्टा में भाजपा का कब्जा है जबकि सोनकच्छ, हाटपीपल्या, शाजापुर व कालापीपल विधानसभा सीटें कांग्रेस के कब्जे में हैं। जिन सीटों पर कांग्रेस ने जीत हासिल की, वहां से वोटों की लीड भी अधिक है। अके ले शाजापुर सीट ही 45 हजार वोटों से कांग्रेस जीती थी। आगर सीट भले ही भाजपा ने जीती हो लेकि न वोट बैंक करीब 25 हजार कम हो गया। भाजपा को चुनौती मिल सकती है।

बिना सांसद के सीट

पिछले चार महीने से अधिक समय से देवास लोकसभा सीट बिना सांसद के हैं। सांसद ऊंटवाल के आगर विधायक चुने जाने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। अब देवास संसदीय क्षेत्र के लोगों को नया सांसद मिल पाएगा।

पांच साल में बड़ी घटनाएं

2016 में संसदीय क्षेत्र कालापीपल के पास जबड़ी रेलवे स्टेशन के समीप भोपाल-उज्जैन पैसेंजर में ब्लास्ट हुआ। जिसके तार यूपी के आतंकि यों से जुड़े थे।

शाजापुर व सोनकच्छ-हाटपीपल्या विधानसभा में जून 2017 में हुए कि सान आंदोलन के दौरान बड़ी घटनाएं हुईं। वाहनों, थानों, चौकियों को आग के हवाले कि या गया। पथराव भी हुआ।

ये वादे रहे अधूरे

  • कोई बड़ा उद्योग या रोजगार उपलब्ध नहीं हो सके । कई उद्योग बंद हो गए।
  • पेयजल को लेकर भी कई क्षेत्रों में स्थिति खराब है।
  • आगर में रेल नहीं आई। हर बजट में उम्मीदें बंधती है लेकि न कछुआ चाल से भी धीमी घोषणा की रफ्तार।
  • शाजापुर व आगर जिले में संतरा, आलू का उत्पादन बेहतर लेकिन फू ड प्रोसेसिंग यूनिट नहीं लग पाई।

53 साल बाद शाजापुर का नाम गायब, देवास हो गई सीट

करीब 53 साल के लंबे इतिहास के बाद शाजापुर का नाम गायब हो गया और अब सिर्फ देवास सीट रह गई है। वर्ष 1951 में यह सीट शाजापुर-राजगढ़ संसदीय क्षेत्र के नाम से पहचानी जाती थी, जो 1957 से 1971 तक शाजापुर संसदीय क्षेत्र हो गई। 1977 में यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई और नाम बदलकर शाजापुर-देवास संसदीय क्षेत्र हो गया।

वर्ष 2004 तक इसी नाम से चुनाव हुए लेकि न 2008 में परिसीमन होने से सीट का नाम बदलकर सिर्फ देवास सीट कर दिया गया। 2009 एवं 2014 के चुनाव इसी नाम से हुए। परिसीमन में देवास सीट से आगर जिले की सुसनेर विधानसभा सीट को राजगढ़ सीट में शामिल कर लिया गया। खास बात ये है कि भले ही सीट का नाम देवास हो लेकि न नामांकन दाखिल होने से लेकर परिणाम घोषणा तक शाजापुर से ही होगी। शाजापुर कलेक्टर को रिटर्निंग अधिकारी बनाया गया है।