प्रेमविजय पाटिल, धार। सरदारपुर विकासखंड के पानपुरा स्थित खरमोर अभयारण्य में हाल में करीब 8 साल बाद दुर्लभ खरमोर पक्षी के 7 जोड़े दिखाई दिए हैं। वन विभाग ने इस बार 30 हेक्टेयर में मूंग और उड़द की फसल बोई गई थी ताकि इन पर लगने वाले कीट और इल्लियों के आकर्षण में ये पक्षी यहां पहुंच सकें। यह प्रयोग सफल रहा है। ये पक्षी अपना प्रजनन काल यहां बिताने आते हैं। गौरतलब है कि पक्षीविद् डॉ. सलीम अली के प्रयास से वन विभाग ने खरमोर अभ्यारण की स्थापना 4 जून 1983 को की थी। करीब 348 वर्ग कि लोमीटर क्षेत्र में यह अभयारण्य फैला हुआ है। इसमें घास के मैदान हैं।

कई वर्षों से अभयारण्य में पक्षी की आमद नहीं हो रही थी। वहीं, सैलाना (रतलाम) में हाल में खरमोर का एक जोड़ा दिखाई दिया है। आबोहवा रास नहीं आने से इक्का-दुक्का पक्षी ही यहां आ रहे हैं। सात साल तक नहीं आया था पक्षी गत वर्ष अभयारण्य में केवल एकमात्र पक्षी दिखाई दिया था, जबकि 2010 से 2016 तक यहां खरमोर नहीं आए। अलबत्ता पास के क्षेत्र में इक्का-दुक्का पक्षी जरूर दिखे थे। इनके अंडे के छिलके भी दिखे थे। पक्षी नहीं आने से वन विभाग भी चिंता में पड़ गया था। परिणाम स्वरूप इस बार नया प्रयोग कि या गया।

अभयारण्य क्षेत्र में पक्षियों के आकर्षण के लिए घास के मैदान के बीच में 30 हेक्टेयर में मूंग और उड़द की फसल बोई गई। इन पर कीटों का प्रकोप अधिक होता है। वन विभाग के सरदारपुर रेंज के एसडीओ राकेश डामोर ने बताया कि करीब 8 साल बाद हमें सात जोड़े यानी करीब 14 पक्षी दिखाई दिए हैं। यह अपने आप में महत्वपूर्ण बात है। मौसम की अनुकू लता और हमारे प्रयोग का यह नतीजा है। इसके पूर्व 2009 में 9 जोड़े यहां दिखाई दिए थे। ये पक्षी राजस्थान के भरतपुर से वर्षाकाल में आते हैं और प्रजनन काल पूरा करने के बाद अक्टूबर में पुन: भरतपुर रवाना हो जाते हैं। घास में छुप जाते हैं: इस अभयारण्य में बहुतायत में ऊंची घास पाई जाती है। शर्मीला पक्षी होने से इसे यहां छुपने में मदद मिलती है। बारिश के दिनों में तापमान कम होने से इनके लिए मौसम अनुकूल रहता है।