धार से प्रेमविजय पाटिल। धार जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर ग्राम सादलपुर में जलमहल स्थित है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की यह धरोहर अकसर लोगों की नजर से दूर रहती है। सादलपुर गांव का भी अपना एक समृद्धशाली इतिहास रहा है। मुगलकाल में बनी इमारत की खूबसूरती तब और निखर आती है जब बारिश में इस महल के बीच से गुजरने वाली बागेड़ी नदी भरी रहती है। उस समय ऐसा लगता है मानो यह महल नदी के साथ अठखेलिया कर रहा हो।

इसकी मजबूत नींव की वजह से वर्षों से नदी के वेग को यह महल आसानी से झेलता आ रहा है। न ही उसके वास्तु पर कोई असर हुआ है। इस तरह यह धरोहर न केवल जल से गहरे नाते की कहानी कहती है बल्कि यह भी बताती है कि उसके निर्माण के समय तकनीक इतनी समृद्ध थी कि बिना किसी जलरोधी सामग्री के भी महल को जल में स्थाई रखने की कला विकसित थी। सादलपुर का जलमहल वास्तव में बागेड़ी नदी के कारण अस्तित्व में आया है। 15वीं शताब्दी में निर्मित यह महल पानी के बिना अधूरा सा लगता है।

बताया जाता है कि सन् 1500 से लेकर 1511 के बीच इसे मांडू के सुल्तान नसीरुद्दीन खिलजी ने बनवाया था। इसके एक स्तंभ पर लिखा है कि 1589 में दक्षिण की ओर जाते समय बादशाह अकबर ने यहां विश्राम किया था। महू और नीमच जैसे छावनी क्षेत्रों को देखते हुए अंदाजा लगाया जाता है कि जिस तरह से अंग्रेजों ने अपने समय में आवागमन के लिए इन दो स्थानों पर छावनी विकसित की थी। उसी तरह से मुगलकाल में भी आवाजाही और रास्ते में पूरी सेना के साथ राजा के लिए शरणस्थली के रूप में इस महल की कल्पना की गई थी।