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    यज्ञ का मतलब त्याग, बलिदान और शुभ कर्म

    Published: Sat, 22 Apr 2017 03:58 AM (IST) | Updated: Sat, 22 Apr 2017 03:58 AM (IST)
    By: Editorial Team

    इंदौर। नईदुनिया प्रतिनिधि

    यज्ञ का तात्पर्य त्याग, बलिदान और शुभ कर्म से है। यज्ञ का एक प्रमुख उद्देश्य धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को संगठित करना है। इस युग में संघ शक्ति ही सबसे प्रमुख है। परास्त देवताओं को पुनः विजयी बनाने के लिए प्रजापति ने उसकी शक्तियों का एकीकरण करके संघ-शक्ति के रूप में दुर्गा शक्ति का प्रादुर्भाव किया था। उस माध्यम से उसके दिन फिरे और संकट दूर हुए।

    यह बात हरिद्वार से आई बहन सुधा महाजन ने शुक्रवार को गुरुधाम गायत्री शक्तिपीठ कनाड़िया पर कही। वे 108 विराट कुंडी गायत्री महायज्ञ में दूसरे दिन संबोधित कर रही थी। उन्होंने कहा कि मानवजाति की समस्या का हल सामूहिक शक्ति पर निर्भर है। एकाकी, व्यक्ति वादी, असंगठित लोग दुर्बल और स्वार्थी माने जाते हैं। गायत्री यज्ञों का वास्तविक लाभ सार्वजनिक रूप से, जन सहयोग से संपन्ना कराने पर ही उपलब्ध होता है। गायत्री परिवार के पं. शंकरलाल शर्मा और सिद्धार्थ सराठे ने बताया कि शनिवार को सुबह 8.30 बजे से यज्ञ एवं संस्कार सहित नारी जागरण गोष्ठी एवं दीप महायज्ञ होगा। संगीतमय प्रवचन शाम 7 बजे होंगे। यज्ञस्थल पर 11 जोड़ो का निशुल्क विवाह संस्कार होगा। 23 अप्रैल को यज्ञ की पूर्णाहुति और शांतिकुंज के विद्वानों की विदाई होगी।

    और जानें :  # dharm
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