जिस तरह भाई-बहनों के त्योहार रक्षा बंधन का विशेष महत्व है उसी तरह भाई दूज का भी अपना विशेष महत्व है। इस दिन बहनें भाई की लंबी आयु और उनके स्वास्थ्य की मंगल कामना का व्रत रखती हैं। यह त्योहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं। भाई-दूज पर देश में अलग-अलग तरह की प्रथाएं हैं। जैसे मध्यप्रदेश के डिंडौरी में भाई-दूज पर शक्कर माला पहनाकर त्योहार मनाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। शहर की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा अधिक प्रचलित है।

भाई-दूज के साथ ही होली पर भी ये मालाएं बाजार में बिकती हैं। भाई-दूज से चार-पांच दिन पहले ये मालाएं बाजार में सज जाती हैं।

वहीं भाई-दूज के मौके पर बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर शक्कर माला इस उद्देश्य से उनकी कलाईयों पर बांधती है कि जीवनभर उनके रिश्ते में मिठास बनी रहे।

वहीं, लोगों का ऐसा मानना है कि होली के दिन माला देकर गुलाल का टीका लगाने से आपसी प्रेम-व्यवहार बढ़ता है। साथ ही रिश्ते और अधिक मजबूत होते हैं।

भाई दूज के दिन बहनों को भाई के माथे पर टीका लगा उसकी लंबी उम्र की कामना करनी चाहिए। इस दिन सुबह पहले स्नान करके विष्णु और गणेश जी की पूजा करनी चाहिए। इसके उपरांत भाई को तिलक लगाना चाहिए। इस दिन भाई को बहन के घर जाकर भोजन करना चाहिए। अगर बहन की शादी ना हुई हो तो उसके हाथों का बना भोजन करना चाहिए। अपनी सगी बहन न होने पर चाचा, भाई, मामा आदि की पुत्री अथवा पिता की बहन के घर जाकर भोजन करना चाहिए।

मान्यता है कि भाई-दूज के दिन सूर्य पुत्र यम ने अपनी बहन यमुना घर जाकर भोजन कर उपहार भेंट किया था। तभी से यह त्योहार यम द्वितीया एवं भाई दूज के रूप में मनाया जाता है। इस दिन यम की पूजा के पश्चात यमुना जी की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके साथ ही इस पर्व पर यमुना में स्नान करने का विशेष महत्व माना जाता है। यम द्वितीया का त्योहार शुरू हुआ। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि कार्तिक शुक्ल द्वितीय को जो भाई अपनी बहन का आतिथ्य स्वीकार करते हैं उन्हें यमराज का भय नहीं रहता। इसीलिए तभी से भाई-बहन के प्यार और स्नेह का त्योहार मनाया जा रहा है।