श्योपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि । श्योपुर जिला सूखाग्रस्त घोषित होने के बाद जिला प्रशासन ने सूखा राहत के तहत 79 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि किसानों को बांट चुका है। बाकी रह गए किसानों के लिए प्रशासन ने सरकार से फिर बजट मांगा है,लेकिन अब राजस्व विभाग के कर्मचारियों पर आरोप लग रहे हैं कि, सूखा राहत का पैसा बांटने में ऐसा बंदरबांट किया जा रहा है कि सालों पहले मर चुके लोगों के खातों में भी हजारों रुपए जमा कराए जा रहे हैं।

भाजपा महामंत्री रामलखन नापाखेड़ली के अलावा प्रेमसर के कई किसानों ने ऐसी शिकायत कलेक्टर व अन्य अफसरों से की है। प्रेमसर के किसान रामकल्याण मीणा, विजयसिंह मीणा, जगदीश मीणा और लोकेन्द्र बैरवा ने क्षेत्र के पटवारी पर आरोप लगाए हैं कि तीन से 11 साल पहले मर चुके किसानों को सूखा राहत का पैसा दिया जा रहा है। इसके लिए पटवारी ने रिश्वत वसूली है।

किसानों का आरोप है कि जिन लोगों ने पैसा नहीं दिया उन किसानों को नुकसान के बाद भी मुआवजा नहीं दिया गया। दूसरी तरफ प्रेमसर पटवारी अरुण दांतरे का कहना है कि, अभी किसी को एक रुपया नहीं बांटा। जिन किसानों को पैसे देने की बात हो रही है उनकी सूची बनी है। बजट आने के बाद इन किसानों के खाते में भुगतान होगा। ?

किसान बोले ऐसे हुई गफलत -

भाजपा नेता नापाखेड़ली ने बताया कि प्रेमसर की पाना पत्नी सोनीराम मीणा की मौत 11 साल पहले हो चुकी है। फिर भी पटवारी ने मृतकर पाना के बैंक खाता क्रमांक 116901100129 में 6776 रुपए जमा करा दिए। हजारी पुत्र रामनाथ मीणा की मौत 3 साल पहले हो चुकी है। फिर भी उसके खेतों में नुकसान बताकर मुआवजे की 46000 रुपए मृतक हजारी के खाता क्रमांक 20281131817 में डाल दिया। मांगीलाल पुत्र बंशीलाल मीणा के बैंक खाता क्रमांक 683506001907 में सूखा राहत के 23378 रुपए जमा कराए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि, मांगीलाल मीणा की मौत 07 साल पहले हो चुकी है।

95 फीसदी धान और मुआवजा उड़द, सोयाबीन का -

किसानों के आरोप और पटवारी का पक्ष अपनी जगह है,लेकिन प्रेमसर में सूखा राहत का पैसा बांटने में धांधली तो की गई है। यह धांधली पटवारी ने नहीं बल्कि और ऊपर के अफसरों व नेताओं ने मिलकर कराई है। दरअसल प्रेमसर क्षेत्र के 95 फीसदी खेतों में धान की फसल बोई गई थी। यह बात क्षेत्र के किसान भी मानते हैं लेकिन जिन किसानों को मुआवजा बांटा जा रहा है उन्हें सोयाबीन व उड़द के नुकसान का पैसा बांटा जा रहा है। सवाल यही है कि जिन किसानों ने सोयाबीन व उड़द की ही नहीं तो उन्हें मुआवजा कैसे दे दिया।