सिंगोली/नीमच। रविवार को सिंगोली क्षेत्र के ग्राम थड़ौद के कि सान दिनेश संगीतला ने खेत में मां कालिका की मूर्तियों की विधि-विधान से स्थापना की और पूजा-अर्चना के बाद से अफीम के डोडों की चिराई का काम शुरू किया। इसी क्षेत्र के अन्य कि सानों ने भी चिराई और लुनाई की शुरुआत कर दी है। झांतला के किसान नेता ओंकारलाल धाकड़ बताते हैं कि अफीम की खेती सम्मान की खेती है। इसमें किसान परिवार के बच्चों से लेकर वृद्ध तक मदद करते हैं।

मेघपुरा चौहान के नानालाल धाकड़ का कहना है कि अफीम की खेती में लागत और आमदनी बराबर पड़ती है। फिर भी किसान सम्मान के कारण यह खेती करता है। चोरों-तस्करों और जंगली जानवरों का भी डर लगता रहता है। नीमच के समीप ग्राम घसूंडी बामनी के अफीम उत्पादक कि सान सत्यनारायण शर्मा ने बताया कि अफीम के खेतों में चिराई और लुनाई का काम बिना पूजा के शुरू नहीं होता। देवी मां की प्रतिदिन पूजा करते हैं। मां कालिका की पूजा के बाद ही अफीम के खेतों में चिराई और लुनाई के लिए कदम रखते हैं। पूजा-पाठ के बिना कोई किसान खेतों में नहीं जाता।

चिराई और लुनाई के पूर्व यह प्रक्रिया

हर साल फरवरी माह के पहले पखवाड़े में पट्टेदार चिराई और लुनाई की शुरुआत करते हैं, लेकि न इसके पूर्व खेत में 5 पत्थरों को सिंदूर अर्पित कर मां कालिका की मूर्तियों की सांके तिक स्थापना की जाती है। विधिवत पूजा-अर्चना के बाद 5 डोडों को संयुक्त रूप से लच्छे से बांधा जाता है। शुभ और विशेष मुहूर्त में पट्टेदार कि सान और श्रमिक इन 5 डोडों को चीरा लगाते हैं। इसके बाद प्रतिदिन पूजा-अर्चना के बाद पट्टेदार कि सान डोडों की चिराई और अफीम की लुनाई का काम करते हैं।

अफीम निकालने की प्रक्रिया

चिराई : किसान पूर्ण रूप से विकसित डोडों पर एक विशेष प्रकार के औजार से चीरे लगाते हैं। चिराई का यह काम प्रतिदिन दोपहर करीब 12 से शाम करीब 4 बजे तक कि या जाता है।

लुनाई : जिन डोडों में चीरे लगाए जाते हैं, अगले दिन एक विशेष यंत्र से डोडों पर जमा होने वाली अफीम को एकत्रित किया जाता है। इसे लुनाई कहा जाता है। लुनाई का यह काम प्रतिदिन सुबह करीब 6 से 9 बजे तक किया जाता है।