सीहोर (अखिलेश गुप्ता)। देशभर में फिटनेस चैलेंज देने और उसे पूरा करने की होड़ मची है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर क्रिकेटर विराट कोहली तक योग-कसरत से फिटनेस मंत्र देने के साथ फिटनेस चैलेंज दे रहे हैं। इन सबके बीच सीहोर की बुजुर्ग अम्मा उर्फ लक्ष्मीबाई की फिटनेस चर्चा का विषय बनी हुई है। अम्मा मानसिक और शारीरिक फिटनेस में अव्वल हैं।

72 साल की उम्र में अम्मा कलेक्ट्रेट परिसर तक साइकिल से आती हैं। लोग 62 साल की उम्र में रिटायर हो जाते हैं, जबकि अम्मा ने 10 साल पहले टाइपिंग का काम शुरू किया। उम्र के साथ अम्मा की टाइपिंग स्पीड बढ़ती गई। अब वे 90 से 100 शब्द प्रति मिनट टाइप कर लेती हैं। मानसिक फिटनेस इतनी जबरदस्त है कि आवेदक केवल आवेदन का विषय, नाम-पता बताता है और अम्मा मिनटों में आवेदन टाइप करके दे देती हैं। अम्मा खुद की फिटनेस का राज जीवनयापन की मजबूरी बताती हैं लेकिन क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग भी अम्मा की फिटनेस के कायल हैं। सहवाग ने यूट्यूब पर उनका तेज गति से टाइपिंग का वीडियो देखा तो ट्वीट कर न सिर्फ उन्हें सुपर वुमेन बताया, बल्कि युवाओं को उनसे प्रेरणा लेने की नसीहत भी दी।

जितना काम, उतना बेटी का भविष्य सुरक्षित

अम्मा कहती हैं कि रुपए कमाने के लिए टाइपिंग करना जरूरी था। जितने ज्यादा कागज टाइप होते हैं, उतने ज्यादा रुपए मिलते हैं। अपनी मानसिक कमजोर बेटी के लिए कुछ रुपए जोड़कर रखना चाहती हूं। मुझे नहीं पता कि मेरे बाद बेटी का क्या होगा? फिर भी चाहती हूं उसके लिए कुछ रुपया जोड़कर रख दूं, जो मेरे बाद उसके काम आएं। यही कारण है कि आखरी सांस से पहले ज्यादा से ज्यादा काम करना चाहती हूं।

अम्मा के संघर्ष की दास्तां

इंदौर की रहने वाली लक्ष्मीबाई पति से अलग होने के बाद सीहोर के गंज में किराए के मकान में बेटी के साथ बस गई। कुछ दिन तो परिचितों ने सहायता की, लेकिन फिर कोई काम नहीं मिलने से जीवन-यापन और बेटी के इलाज का संघर्ष शुरू हो गया। जगह-जगह भटकने के बाद जब काम नहीं मिला तो 2008 में उन्होंने तत्कालीन कलेक्टर राघवेंद्र कुमार सिंह और एडीएम भावना वालिम्बे से रोजगार दिलाने की गुहार लगाई। सिंह ने जब उनसे पूछा कि आप इस उम्र में क्या कर सकती हैं तो अम्मा ने कहा कि टाइपिंग मशीन और जगह उपलब्ध करा दो, मैं उसी से जीवन यापन कर लूंगी।

सिंह ने उन्हें टाइपिंग मशीन और कलेक्ट्रेट परिसर में बैठने की जगह उपलब्ध करा दी। 72 साल की उम्र में अंगुलियों ने भी रफ्तार पकड़ ली। अम्मा पलक झपकते ही आवेदन टाइप कर देतीं हैं। शिकायती हो या राजस्व का पेचीदा आवेदन, ऐसा कभी नहीं हुआ कि अम्मा के आवेदन में गलती निकली हो। यही कारण है कि वकील हों या बाबू, सभी अम्मा की तारीफ करते हैं।

वृद्धाश्रम में रहकर बेटी के लिए चल रहा संघर्ष

अम्मा का कहना है - जब तक उंगलियां चल रही हैं, बेटी के लिए संघर्ष कर रही हूं। 10 साल पहले 10 रुपए में आवेदन टाइप करती थी और आज भी दस ही रुपए लेती हूं, जो भी 100-150 रुपए दिनभर में मिलते हैं, वह बेटी के इलाज और भरण-पोषण में खर्च कर देती हूं। वर्तमान में वृद्धाश्रम में रह रही हूं। एक बार वहां कुछ लोगों से कहा-सुनी होने और बेटी से अभद्रता होने पर नईदुनिया अखबार ने भी काफी मदद की थी। अब मैं क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग, शासन और दानदाताओं से मांग करती हूं कि मेरी बेटी के इलाज और रहने के लिए आवास की सुविधाा करा दी जाए तो बचा-खुचा जीवन संवर जाए।