वरुण शर्मा, ग्वालियर। मैं अशोक कुमार प्रधान अपनी इच्छा से देह को रिसर्च के लिए गजराराजा मेडिकल कॉलेज को दान करता हूं। मेरी मृत्यु पश्चात अगर मेरे परिवारजन की मनोस्थिति बदल भी जाती है तो इसे मान्य न किया जाए।

29 जनवरी 2018 को बीमारी के चलते दुनिया से अलविदा कहने वाले रिटायर्ड शिक्षक अशोक कुमार प्रधान की अंतिम इच्छा यही थी। बकायदा नोटरी पर यह लिखकर गये थे, मेडिकल कॉलेज का फार्म भी भरा था। लेकिन पारिवारिक विवाद के चलते उनकी अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं हो सकी।

मेडिकल कॉलेज को देहदान के बाद बेटों का मन बदला, निधन के चौथे दिन एनाटॉमी विभाग के फ्रीजर से वापस देह निकलवाकर ले गए और अंतिम संस्कार कर दिया। स्व प्रधान के नजदीकी मित्र बेटों के इस कृत्य से बेहद खिन्न् हैं। उनका कहना है कि स्व प्रधान की देह का ही नहीं उनकी अंतिम इच्छा का भी अंतिम संस्कार कर दिया गया।

10 साल से परिवार से अलग, दोस्त ही था सबकुछ

80 साल के रिटायर्ड शिक्षक अशोक कुमार प्रधान का 29 जनवरी को निधन हो गया था। स्व प्रधान के मित्र भागीरथ शर्मा ने बताया कि उनका परिवार पत्नी व बच्चे उज्जैन में रहते हैं। वे ग्वालियर में पिछले 10 साल से अकेले ही रह रहे थे। लंबे समय से परिवार से नाराज होने के बाद वे खुद को दुनिया में अकेला ही मानते थे।

उनके मित्र भागीरथ शर्मा को उन्होंने परिवार से भी बढ़कर माना था। 11 मई 2017 को ही स्व प्रधान ने जीआरएमसी मेडिकल कॉलेज को देहदान का फार्म भरकर सौंप दिया था।

शपथ पत्र में वे लिखकर गए थे कि उनके सबसे करीबी सिर्फ मित्र भागीरथ शर्मा हैं और देहदान की सूचना तक परिवार को देना जरुरी नहीं है। दो एफडी (95 व 50 हजार) भागीरथ शर्मा को उचित जगह खर्च करने का अधिकार है। उनका सामान तक परिवार को नहीं बल्कि भागीरथ शर्मा को दिए जाने का लिखकर गए।

दान देह ले गए,मुझे बताया तक नहीं

उनका परिवार पहले तो दानदेह का डेथ सर्टिफिकेट न मिलने शव छोड़ गया और फिर उन्होंने चुपचाप कब मन बदल लिया और शव को ले गए मुझे इसकी जानकारी तक नहीं दी। जीते जी तो साथ नहीं रहे कम से कम अंतिम इच्छा तो पूरी कर देते।

भागीरथ शर्मा,स्व प्रधान के मित्र

हां शव वापस ले आए हैं

पिताजी ने कब देहदान किया,हमें कोई जानकारी नहीं है। पिताजी का अंतिम संस्कार रीति-रिवाज से कर दिया,जीआरएमसी से शव ले आए थे। इसके बारे में जीआरएमसी से संपर्क किया जा सकता है।

सतवेश प्रधान,स्व प्रधान के बेटे

परिजन की इच्छा थी तो हमने वापस कर दिया शव

पहले परिजन सहमति दे गए थे लेकिन स्व प्रधान की पत्नी व अन्य सदस्यों का बाद में मन नहीं माना। सभी लोग आए थे और स्व प्रधान के शव को ले गए। परिजन की इच्छा मान्य होती है।

डॉ एसके शर्मा, विभागाध्यक्ष,एनाटॉमी,जीआरएमसी