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    चुनावी वर्ष में जगह-जगह गढ़ गए मांगे मनवाने के लिए तंबू

    Published: Wed, 14 Mar 2018 03:44 AM (IST) | Updated: Wed, 14 Mar 2018 03:44 AM (IST)
    By: Editorial Team

    ग्वालियर। नईदुनिया प्रतिनिधि

    स्कूलों में पदस्थ शिक्षा कर्मियों को पहले अध्यापक संवर्ग में लाने, उसके बाद 21 दिसम्बर 2017 को मुख्यमंत्री द्वारा शिक्षक वर्ग का दर्जा देने की घोषणा ने अन्य विभागों में पदस्थ कर्मचारियों की बुझती आस को फिर से जिंदा कर दिया है। स्थिति यह है कि अब हर विभाग के कर्मचारियों को लग रहा है कि इस चुनावी साल में उनकी मांगें भी पूरी हो सकती हैं। अकेले ग्वालियर में लगभग आधा दर्जन संगठन अपनी मांगों को लेकर कहीं फर्श पर तो कहीं तंबू लगाकर बैठे हैं। सरकार इनकी मांगों पर दो टूक फैसला करने में समय लगा रही है। नतीजे में कहीं छात्र तो कहीं मरीज परेशान हो रहे हैं। नईदुनिया ने इन सभी आंदोलनों का जायजा लिया,पेश है एक रिपोर्ट।

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    संस्थानः जीवाजी विश्वविद्यालय

    हड़ताली संगठनः मप्र विश्वविद्यालयीन (गैर शिक्षक) कर्मचारी महासंघ (घोषित रूप से)

    जीवाजी विश्वविद्यालय दैनिक वेतन भोगी,89 दिवस कर्मचारी संघ (अघोषित रूप से)

    मुख्य मांगः दैनिक वेतन भोगियों व 89 दिवस कर्मचारियों को नियमित किया जाए। नियमित कर्मचारियों को सातवें वेतनमान का लाभ व उसी अनुसार पेंशन दी जाए। जेयू में नियमित कर्मचारियों को सातवें वेतनमान का लाभ मिल चुका है। अन्य विश्वविद्यालय में यह लाभ नहीं मिला है। आंदोलन प्रांत व्यापी है, इस कारण यहां भी नियमित कर्मचारी हड़ताल (कार्य बहिष्कार) पर हैं।

    हड़ताली कर्मचारियों की संख्या : अघोषित रूप से दैनिक दर व 89 दिवस के कुशल व अकुशल श्रेणी के 259 कर्मचारी। 325 नियमित कर्मचारी घोषित रूप से कार्य का बहिष्कार कर रहे हैं।

    हड़ताल का असरः बीए, बीएससी, बीकॉम की इसी माह के अंत से परीक्षाएं शुरू होनी हैं,लेकिन हड़ताल के कारण परीक्षा फार्म ही नहीं भर पा रहे हैं। नामांकन का काम अधूरा पड़ा है। बीए, बीएससी, बीकॉम का तृतीय व पंचम सेमेस्टर व एमए,एमएससी,एमकॉम का परिणाम तैयार नहीं हो पा रहा है।

    मांगें मानने पर व्यय भार : शासन पर कोई व्यय भार नहीं आएगा। जेयू ने स्वयं वहन करने पहले ही सहमति दे दी थी। 15 दिसम्बर 2016 को शासन को भेजी गई रिपोर्ट के अनुसार नियमितीकरण पर 1.83 करोड़ प्रति वर्ष का अतिरिक्त व्यय भार आएगा।

    मांगें माने जाने की संभावनाः

    स्थाईकरण व नियमितीकरण को लेकर शासन पहले ही नीतिगत निर्णय कर चुका है। कई विभागों में अमल भी हो चुका है। यहां भी मांग माननी ही पड़ेगी। सातवें वेतनमान को भी शासन को देना ही होगा। जेयू में यह मिल ही चुका है। समस्या अन्य विश्वविद्यालयों में इस व्यवस्था को लागू कर पाने की है।

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    संस्थानः राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय व कृषि महाविद्यालय।

    हड़ताली संगठनः

    01 राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय श्रमिक/कर्मचारी संघ ।

    02 मप्र लघु वेतन कर्मचारी संघ (कृषि महाविद्यालय ग्वालियर)

    मुख्य मांगः राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय श्रमिक/कर्मचारी संघ की मुख्य मांग यह है कि यहां के कर्मचारियों को शासन के नियमानुसार मासिक दर से वेतन दिया जाए। इस विश्वविद्यालय में कर्मचारियों को एक अलबेली परंपरा 158 घंटे के कर्मचारियों की श्रेणी दी गई है। यह परंपरा कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर ने बिना किसी नियम या निर्देश के 2007 में बनाई थी। उसी को यहां अपनाया गया है। इस परंपरा के फेर में यहां तैनात कर्मचारियों से काम तो महीने भर लिया जाता है,लेकिन भुगतान कलेक्टर रेट के अनुसार सिर्फ 19 दिन 6 घंट का किया जाता है। कर्मचारियों की मांग है कि कम से कम कलेक्टर रेट से भुगतान हो और उपस्थिति दर्ज की जाए।

    दूसरे संघठन लघु वेतन कर्मचारी भी अजब समस्या से पीड़ित हैं। यहां इन्हें मस्टर रोल पर रखा गया है। जो 1988 के पूर्व से कार्यरत हैं, उन्हें 26 दिन का वेतन मिलता है। उसके बाद रखे गए कर्मचारियों को 20 दिन के कार्य का ही भुगतान किया जाता है। इनकी मांग है कि 1988 से पूर्व वालों का नियमितीकरण हो, बाद वालों को पूरे महीने कार्य कराए जाने के एवज में कलेक्टर रेट से भुगतान हो।

    हड़ताली कर्मचारियों की संख्या : 158 घंटे की दर पर रखे गए कर्मचारियों की संख्या 175 है। मस्टर कर्मचारियों की संख्या 70 है।

    हड़ताल का असरः यहां कृषि विश्वविद्यालय व कृषि महाविद्यालय दोनों ही जगह काम के लिए सिर्फ नियमित कर्मचारी ही बचे हैं। इस कारण परीक्षा, मार्च क्लोजिंग, कॉलेज के नियमित कार्य प्रभावित हो रहे हैं।

    मांगें मानने पर व्यय भार : विश्वविद्यालय व कॉलेज दोनों ही जगह के कर्मचारियों को 19 दिन 6 घंटे के मान से भुगतान किया जा रहा है। कर्मचारियों की मांग महीने भर (26 दिन) के मान से भुगतान की है। इस कारण अंतर सिर्फ 6 दिन 18 घंटे के भुगतान का है। एक मोटे अनुमान के अनुसार यहां 40.72 लाख रुपए सालाना का अतिरिक्त व्ययभार मांगें मानने पर आएगा। मस्टर रोल वालों पर व्ययभार का आकलन अलग-अलग सीनियरिटी के कारण हुआ नहीं है।

    मांगें माने जाने की संभावनाः

    158 घंटे वाले कर्मचारियों के नियमितीकरण का मामला पहले से ही कोर्ट में है। मौजूदा भुगतान श्रम कानूनों के विरुद्घ है। विश्वविद्यालय प्रशासन को हर हाल में कलेक्टर रेट पर भुगतान के लिए बाध्य होना ही होगा। यदि विश्वविद्यालय स्वयं यह काम नहीं करेगा तो सहायक श्रमायुक्त को यह आदेश जारी करने ही होंगे।

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    03

    संस्थानः प्रदेश के सभी शासकीय महाविद्यालयों

    हड़ताली संगठनः अतिथि विद्वान एकता महासंघ ।

    मुख्य मांगः यूजीसी के वेतनमान अनुसार कम से कम तीन साल की संविदा अवधि पर यूजीसी गाइडलाइन के अनुसार फिक्स वेतन 40 हजार रुपए प्रतिमाह पर रखा जाए। अतिथि विद्वानों के स्थान को भरने के लिए निकाली गई पीएससी भर्ती को निरस्त किया जाए।

    हड़तालियों की संख्याः अतिथि विद्वान व अन्य की संख्या पूरे प्रदेश में 12 हजार है। इसमें अतिथि विद्वान, ग्रंथ पाल,स्पोर्ट्स टीचर शामिल हैं।

    हड़ताल का असरः 2 फरवरी से हड़ताल का दौर जारी है। इससे पूर्व भी आंदोलन चलते रहे। इस कारण कॉलेजों में छात्रों का कोर्स ही पूरा नहीं हो सका।

    मांगें मानने पर व्यय भार : अतिथि विद्वानों को जरूरत अनुसार प्रति पीरियड 275 रुपए, अधिकतम तीन पीरियड दिए जाने का प्रावधान है। वर्ष में जरूरत अनुसार 6 से 8 महीने तक इनसे काम लिया जाता है। कार्यदिवस की संख्या औसतन 20 दिन रहती है। कार्यदिवस व पीरियड संख्या अलग-अलग होने से इन्हें संविदा पर रखे जाने पर वित्तीय भार की गणना फिलहाल किसी भी स्तर पर नहीं की गई है।

    मांगें माने जाने की संभावनाः

    प्रदेश सरकार अतिथि विद्वानों की मांग को किसी भी सूरत में मानने को तैयार नहीं है। सरकार सिर्फ तीन हजार नियमित सहायक प्राध्यापकों को पीएससी के जरिए रखने विज्ञापन जारी कर चुकी है। वहीं इनकी संख्या लगभग 12 हजार से अधिक है। मांगें मानने पर बड़ा वित्तीय भार सरकार पर आएगा। इनकी संख्या वोट समीकरण के लिहाज से भी प्रभावित करने वाली नहीं है। इस कारण मांगें माने जाने की संभावना सिर्फ एक प्रतिशत है।

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    संस्थानः लोक स्वास्थ्य परिवार कल्याण विभाग

    हड़ताली संगठनः मप्र संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी संग(घोषित रूप से)

    मुख्य मांगः दो साल पहले अप्रेजल के दौरान प्रदेश भर से निष्कासित किए गए करीब 3500 संविदा कर्मचारियों को वापस लिया जाए। संविदा कर्मचारियों को नियमित किया जाए।

    हड़ताली कर्मचारियों की संख्या : जिले में 318 संविदा कर्मचारी, जिसमें एएनएम, स्टाफ नर्स, आयुष चिकित्सक, अर्बन डिस्पेंसरी के कुछ डॉक्टर, फार्मासिस्ट, डाटा एन्ट्री ऑपरेटर, जिला कार्यक्रम प्रबंधक, जिला प्रोग्राम मैनेजर, केयर टेकर आदि शामिल हैं।

    हड़ताल का असरः एनआरसी ठप होने से कुपोषित बच्चों को भर्ती नहीं किया जा रहा है। जिला अस्पताल के एसएनसीयू में बच्चों की देखभाल के लिए अनट्रैंड स्टाफ को रखना पड़ा है। जिले में टीकाकरण, पल्स पोलियो अभियान सहित अन्य शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन में दिक्कत आ रही है। डिस्पेंसरियों में फार्मासिस्ट नहीं होने से कर्मचारियों से दवाएं बंटवाई जा रही हैं।

    मांगें मानने पर व्यय भार : नियमितिकरण होने पर एक कर्मचारी के वेतन में औसत 10 हजार की बढ़ोत्तरी होगी। ऐसे में 318 कर्मचारियों के नियमित होने पर प्रतिमाह 3,180,000 का भार आएगा।

    मांगें माने जाने की संभावनाः

    स्थाईकरण व नियमितीकरण को लेकर शासन पहले ही नीतिगत निर्णय कर चुका है। कई विभागों में अमल भी हो चुका है। प्रदेश में संविदा कर्मचारियों की संख्या करीब 19 हजार है, ऐसे में आगामी समय में विधानसभा चुनाव को देखते हुए यहां भी मांग मानी जा सकती है।

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