ग्वालियर। ग्वालियर अंचल को हरा-भरा करने के लिए इस बार सीड बॉल का उपयोग किया जाएगा। इस बार बारिश के मौसम में 1.25 लाख सीड बॉलों को रमौआ बांध के आसपास की पहाड़ी, शारदा बाल ग्राम और उसके आसपास की पहाड़ी एवं चंबल नदी के किनारों पर बिखेरा जाएगा। इन सीड बॉल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इनके अंदर रखा बीज अपने आप ही अंकुरित होगा और बिना किसी रखरखाव के वृक्ष बनने तक का सफर पूर्ण कर लेगा।

स्वदेशी जैविक भूमि एवं कृषि संरक्षण समिति द्वारा मिशन 100 करोड़ पेड़ चलाया जा रहा है। यह मिशन देश के 9 राज्यों में चल रहा है इसमें मध्यप्रदेश भी शामिल है। इस मिशन के तहत ग्वालियर में पहली बार सीड बॉल का उपयोग किया जा रहा है। इसके लिए स्वदेशी वृक्षों के बीजों को एकत्रित किया जाता है। इसके बाद इन बीजों को मशीन के जरिए मिट्टी की छोटी-छोटी गेंदों में बीजों को रख दिया जाता है। मिट्टी के अंदर बीज सुरक्षित रहता है। इसके बाद बारिश के मौसम में इन बीजों को बिखेरा जाएगा। बारिश के मौसम में यह बीज अपने आप अंकुरित हो जाएंगे। साथ ही चार माह बारिश की नमी में यह बीज पौधों का रूप ले लेंगे। जोकि दो से तीन साल में पूर्णरूप से वृक्ष बन जाएंगे।

रखरखाव की जरूरत नहीं

स्वदेशी जैविक भूमि एवं कृषि संरक्षण समिति के राष्ट्रीय संयोजक रोहित उपाध्याय ने बताया कि सीड बॉल के द्वारा उगाए गए पौधों को रखरखाव की जरूरत नहीं है। क्योंकि यह बीज से पौधा अपने आप ही निकलता है। इस कारण इन पौधों का व्यवहार जंगल में उगने वाले वृक्षों के समान ही होता है जो कि हर मौसम से लड़कर पौधे से वृक्ष बन जाते हैं। जबकि नर्सरी में उगाए गए पौधों को रखरखाव की 3 साल तक जरूरत होती है। इसलिए नर्सरी में गाए गए पौधों के बड़े होने का प्रतिशत कम रहता है।

इन पौधों के बीजों को बिखेरा जाएगा

इस बार बारिश के मौसम में गूलर, नीम, देशी बबूल, बरगद, तुलसी, अमलतास, अर्जुन, मौलश्री, बांस, सूबबूल आदि के बीजों को सीड बॉल के माध्यम से बिखेरा जाएगा।

शारदा बालग्राम, रमौआ और चंबल का चयन इसलिए

रोहित उपाध्याय ने बताया कि सीड बॉलों को बिखेरने से पहले हमने जगह का चयन किया था। इसके लिए सबसे उपयुक्त जगह हमें रमौआ बांध की पहाड़ियां, चंबल नदी के किनारे और शारदा बाल ग्राम की पहाड़ियां लगी। इसका कारण है कि रमौआ बांध बारिश के मौसम में भर जाएगा। साथ ही इसे खाली करने पर भी रोक है। इस कारण बारिश के मौसम के अतिरिक्त भी यहां की पहाड़ियों की मिट्टी में बारिश के अलावा तीन से चार माह तक नमी रहेगी। प्राकृतिक रूप से बीज से पौधों को सात आठ माह का समय विकसित होने के लिए पर्याप्त होता है।

इन राज्यों में कर रही है टीम कार्य

स्वदेशी जैविक भूमि एवं कृषि संरक्षण समिति की टीमें, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, पंजाब, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, तेलंगाना, और तमिलनाडु में कार्य कर रही हैं।

इनका कहना है

स्वदेशी जैविक भूमि एवं कृषि संरक्षण समिति का इस कार्य में रामकृष्ण आश्रम द्वारा पूर्ण सहयोग किया जा रहा है। साथ ही शारदा बालग्राम में उगने वाले पौधों की देखरेख भी हमारे द्वारा ही की जाएगी। साथ ही हमारे यहीं पर इन सीड बॉलों को तैयार किया जा रहा है।

मनीष महाराज, प्रबंधक रामकृष्ण आश्रम

इनका कहना है

हमारी यह समिति राजस्थान के विश्नोई समाज से प्रेरित होकर बनी है। हमारे समिति का उद्देश्य देश को हराभरा बनाना है। इसके लिए हमने मिशन 100 करोड़ वृक्ष तय किया है। इसके तहत हम लोग कार्य कर रहे हैं। सीड बॉल और नर्सरी के पौधों में अंतर सिर्फ इतना है जितना एक मजदूर और वीआईपी के बच्चों में है। मजदूर का बच्चा हर परिस्थिति में पनप जाता है। जबकि वीआईपी बच्चों को बहुत देखभाल की जरूरत होती है।

रोहित उपाध्याय, राष्ट्रीय संयोजक स्वदेशी जैविक भूमि एवं कृषि संरक्षण समिति