डॉ. अमरनाथ गोस्वामी, ग्‍वालियर। सवर्ण आंदोलन की सुनामी ने चुनावों से ऐन पहले नए-पुराने, बने-बनाए तमाम राजनीतिक समीकरणों को उलट-पुलट कर रख दिया है। संभाग में विरोध के चलते पिछले 10 दिनों से क्या भाजपा, क्या कांग्रेस दोनों दलों के बड़े नेता सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाने से बच रहे हैं।

अंचल इस विरोध प्रदर्शन की राजधानी बन गया है इसलिए यहां विरोध दबाने में भाजपा को पसीने छूट रहे हैं। एक्ट पर विधेयक पारित करवाने में समर्थन भले ही कांग्रेस ने भी किया हो, लेकिन सत्ता में चूंकि भाजपा है, इसलिए सवर्ण समाज के आक्रोश का केंद्र बिंदू भी वही है।

ग्वालियर अंचल में इस आंदोलन से किस राजनीतिक दल को कितना फायदा-नुकसान होता है? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आंदोलन कितने दिनों तक चलता है। नाराज सवर्ण समाज के सामने नया विकल्प क्या आता है। ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, अशोकनगर और गुना जिलों से बने संभाग की 21 विधानसभा सीटों में से 8 पर कांटे का मुकाबला हो सकता है। और कुछ सीटों पर प्रत्याशी बदलकर वापसी की जा सकती है।

भाजपाई पिछले एक साल से चुनावों की तैयारी ये सोचकर कर रहे थे कि प्रदेश में चौथी बार सरकार उनकी ही बनेगी। विरोधी कांग्रेस अंतर्कलह से ही नहीं उबर पा रही है। तीसरा कोई विकल्प यहां है नहीं। विधायक बनने का

सपना पाले तमाम नेता ये सोचकर सक्रिय हो रहे थे कि भाजपा का टिकट ही उनकी जीत का सर्टिफिकेट बन जाएगा। भाजपाई के बड़े नेता मान रहे हैं कि यदि ये आंदोलन विधानसभा चुनाव तक चलता रहा तो मुसीबत खड़ी करेगा।


विरोध का दौर जारी

पहले गुना कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को काले झंडे दिखाए गए, उसके बाद मुरैना में भाजपा के राज्यसभा सांसद प्रभात झा को। 6 सितंबर को ग्वालियर में जब भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे और संगठन महामंत्री प्रदेश सुहास भगत आए तो मुट्ठी भर एक्ट विरोधियों को संभालने संभागीय बैठक स्थल को पुलिस छावनी में तब्दील करना पड़ा।

8 सितंबर को तो मुरैना की अंबाह तहसील में हद ही हो गई। भाजपा पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ की बैठक लेने आए कुकुट पालन विभाग के अध्यक्ष मुंशीलाल (राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त) पर काला तेल फेंक दिया गया। विरोध इतना बढ़ गया कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को अपना 19 सितंबर का प्रस्तावित दौरा रद्द करना पड़ा। मंत्रियों के बंगलों की सुरक्षा बढ़ाना पड़ी।

गढ़ ग्वालियर, दतिया अजातशत्रु

ग्वालियर में भले ही 6 विधानसभा सीटों में से 2 पर कांग्रेस का कब्जा हो, लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेता ग्वालियर को गढ़ ही मानते हैं। यही कारण है कि यहां 4 में से 3 विधायक मंत्री हैं। दतिया की तीनों सीटें भाजपा के

कब्जे में हैं। शिवपुरी में 5 से 3 पर कांग्रेस काबिज है। अशोक नगर में कांग्रेस के पास दो तो भाजपा का एक सीट पर कब्जा है। गुना में बराबरी से 2-2 सीटों का बंटवारा है।

8 सीट पर टक्कर

संभाग से ग्वालियर में 6, दतिया में 3, शिवपुरी में 5, गुना में 4 व अशोकनगर में 3 विधानसभा सीटें हैं। कुल मिलाकर 21 सीटों में से 12 भाजपा व 9 कांग्रेस के पास हैं। इनमें से 8 सीटों पर मुकाबला कांटे का हो सकता है। ग्वालियर में सत्तारूढ़ भाजपा को एक सीट पर बागी उम्मीदवारों से खतरा ज्यादा है।

यात्रा में आशीर्वाद, अब विरोध का डर

आंदोलन से पहले ग्वालियर-चंबल अंचल में गुना, मुरैना व भिंड में मुख्यमंत्री जनआशीर्वाद यात्रा कर चुके हैं। सबसे यादगार यात्रा भिंड जिले में निकली थी। ग्वालियर व अन्य जिलों में यह यात्रा पहले अगस्त के अंतिम सप्ताह में प्रस्तावित थी, अब हालात इतनी तेजी से बदल चुके हैं कि विरोध के थमने से पहले यहां यात्रा लेकर आने से पहले पार्टी नेताओं को दस बार सोचना पड़ेगा।