दीपक सविता, ग्वालियर। केंद्र में मोदी सरकार के टॉप-टेन मंत्रियों में शामिल नरेंद्र सिंह तोमर व प्रदेश में कमलनाथ सरकार के तीन कैबिनेट मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर, लाखन सिंह व इमरती देवी के जिले में ग्रामीणों को आज भी शहर में आने के लिए नदी में डूबकर आना पड़ता है। जी हां हम बात कर रहे हैं तिघरा की लाइफ लाइन सांक नदी की। जिसमें पानी आने से नौ गांवों के पच्चीस हजार ग्रामीणों का संपर्क शहर से कट गया है। इसका असर ग्रामीणों के दूध व्यवसाय पर भी पड़ा है। दूध को शहर तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को अभी लगभग चार फीट पानी में से बाइक लेकर निकलना पड़ रहा है।

यह स्थिति तब है जब पेहसारी से तय स्तर पर पानी छोड़ा जा रहा है। बारिश के चार माह तो यह गांव पूरी तरह से शहरी क्षेत्र से कट जाते हैं। ऐसे में अगर कोई बीमार पड़ जाए या कोई परेशानी आ जाए तो वह शहर में नहीं आ पाते हैं।

तिघरा में पानी पहुंचाने वाली सांक नदी के दूसरी ओर पवा, पवाया, मडईयां, मिर्चा, झाला, गिर्जा, लखनपुरा, राई, नगदा गांव पड़ते हैं। गांव हैं। इन गांवों से बरई तक पहुंचने के लिए सांक नदी को पार करना पड़ता है। जब नदी में पानी नहीं होता है तो लोग इसे आसानी से पार कर लेते हैं। लेकिन जब नदी में पानी आ जाता है तो नदी को पार करना बेहद खतरनाक हो जाता है। बारिश के समय में नदी करीब 15 से 20 फीट ऊपर चलती है जिससे नदी को पार करना असंभव हो जाता है। इस कारण इन गांवों में रहने वाले लोग बारिश के महीनों में बाहरी दुनिया से कट जाते हैं। साथ ही इन गांवों के ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय दूध का कारोबार है। ग्रामीण दूध को प्रतिदिन बरई और ग्वालियर लेकर आते हैं। लेकिन जब नदी में पानी आ जाता है तो ग्रामीणों का कारोबार ठप हो जाता है।

सबसे ज्यादा परेशानी उस समय होती है जब कोई बीमार पड़ जाए या किसी प्रसूता को प्रसव पीड़ा हो। क्योंकि नदी में पानी होने से ग्रामीण मरीज को शहर तक नहीं ला पाते हैं।

वोट मांगने जाते हैं नेता, परेशानी हल कोई नहीं करता

सांक नदी के दूसरी तरफ बसे गांव सदियों पुराने हैं। इन गांवों में आजादी के बाद से लेकर अभी तक हुए विधानसभा और लोकसभा चुनावों में हर बार नेता पहुंचते हैं और नदी पर पुल बनाने का आश्वासन देते हैं। ग्रामीण हर बार इन नेताओं की बातों पर भरोसा करते हैं, लेकिन आज तक किसी भी नेता ने नदी पर पुल बनवाने के लिए कोई पहल नहीं की है।

जान हथेली पर लेकर करते हैं नदी पार

पेहसारी से सांक नदी में प्रतिदिन 200 क्यूसिक पानी छोड़ा जा रहा है। इस पानी के कारण अभी सांक नदी में करीब 6 फीट से अधिक पानी चल रहा है। नदी का जहां पर पाट चौड़ा है वहां पर चार फीट के लगभग पानी है। इन्हीं स्थानों से गांव वाले अपनी बाइक पर दूध लेकर नदी पार करते हैं।

2 माह में चेन स्पाकेट और 3 साल में खत्म हो जाता है इंजन

ग्रामीणों को प्रतिदिन पानी के अंदर से अपनी बाइक निकालनी पड़ती हैं। जिससे साइलेंसर के अंदर से होकर पानी इंजन तक पहुंच जाता है। साथ ही चेन स्पॉकेट भी गीला होने के कारण जल्दी खराब हो जाता है। यही कारण है कि हर दो माह में ग्रामीणों को अपनी बाइक के चेन स्पॉकेट बदलवाना पड़ते हैं। जबकि गाड़ी का इंजन पानी के कारण तीन साल के अंदर खत्म हो जाता है।

पॉलीथीन फंसा कर करते हैं पानी भरने से रोकने का प्रयास

गाड़ी के साइलेंसरों में पानी नहीं जाए इसके लिए ग्रामीणों ने अलग ही तरीका खोजा है। ग्रामीण साइलेंसरों में पॉलीथीन लगा देते हैं इससे ग्रामीणों को कुछ हद तक तो राहत मिलती है लेकिन यह भी अधिक समय तक कारगर नहीं होता है।

इनका कहना है

नदी पर पुल नहीं होने के कारण बारिश में चार माह तक ग्रामीण शहर और दूसरे गांवों से कट जाते हैं। अगर कोई बीमार हो जाए तो उसे लेकर नदी पार करना भी संभव नहीं होता है। क्योंकि नदी जब चलती है तो उसमें तिघरा बांध से मगर भी आ जाते हैं। वहीं चार माह तक बच्चे भी पढ़ने के लिए स्कूल नहीं जा पाते हैं। अभी नदी में जहां पर पाट चौड़ा है और पानी कम है वहीं से बाइक निकालते हैं। नदी में से रोजाना बाइक निकालने के कारण बाइक का तीन साल में इंजन खत्म हो जाता है।

-छोटे ठाकुर, निवासी नगदा

इनका कहना है

बरई गांव के आगे सांक नदी पर बांध नहीं होने के कारण लोगों को नदी तैरकर पार करनी पड़ती है। बारिश में ग्रामीण गांवों में कैद होकर रह जाते हैं इसकी जानकारी मुझे नहीं थी। मैं अब इस मामले को देखता हूं और वहां के लिए जो भी अच्छा हो सकेगा मैं करूंगा।

-प्रद्युम्न सिंह तोमर, खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री