इंदौर से हर्षलसिंह राठौड़। वे भी औरों की तरह बीमारी से पीड़ित हैं...लाचार हैं लेकिन उन्हें किसी की सहानुभूति नहीं मिलती है। 21वीं सदी में भी वे पिछले जन्म के पापों का ताना सुनकर शहर के किसी कोने में परकोटे को अपना इलाका मान रहने को मजबूर हैं। आज भी उन्हें पास बैठाने में लोग कतराते हैं। समाज की दकियानूसी सोच इन कुष्ठ रोगियों को मेहनत की दो जून की रोटी खाने की इजाजत देने को तैयार नहीं है लेकिन अब उनकी बेटियों और बहुओं ने मिलकर उनके माथे से यह कलंक मिटा दिया है।

ये हैं हीरा भंडारी, सरिता धुंधले और रीना सांकरे। दुनियाभर में कुष्ठ रोगियों के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था 'सासाकावा इंडिया लेपरसी फाउंडेशन' द्वारा 2017-18 में राष्ट्रीय स्तर पर मध्य प्रदेश से इन तीनों का चयन किया गया और एक लाख रुपए के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। तीनों ने समाज की धारणाओं से लड़कर अपने माता-पिता और सास-ससुर को भिक्षावृत्ति से बाहर निकाल लिया है। आठ साल का समय लगा लेकिन रेडिमेड कपड़ों का अपना कारोबार खड़ा कर लिया।

आज वे न केवल अपने पैरों पर खड़ी हैं बल्कि पूरे परिवार को मेहनत की रोटी खिला रही हैं। कभी भीख मांगने जाने वाले उनके माता-पिता और सास-ससुर उनका हाथ बंटाते हैं। 40 वर्षीय हीरा भंडारी के साथ मां भागाबाई रहती हैं। भागाबाई कुष्ठ से पीड़ित हैं। जब पिता लक्ष्मण जीवित थे तो दोनों मिलकर भिक्षावृत्ति करते थे। पिता की मौत के बाद बेटी हीरा मां और परिवार का सहारा बनी। इसी तरह 36 वर्षीय सरीता धुंधले ने मां शांताबाई, पिता घनश्याम तथा 30 वर्षीय रानी सांकरे ने सास-ससुर को भिक्षावृत्ति से बाहर निकाला है।

हीरा कहती हैं हम तीनों ने मिलकर पहले कपड़ों की दुकान खोली। शुरू में ज्यादा लोग नहीं आते थे इसलिए खर्चा निकालने के लिए सिलाई का काम भी करना पड़ा। अब हर व्यक्ति को 7000- 8000 रुपए महीने की आमदनी होने लगी है। परिवार आर्थिक रूप से घर चलाने में सक्षम हो गया है। हमारे बुजुर्ग घर की देखभाल करते हैं।

रिश्तों की अहमियत समझी : रानी सांकरे तो एक ऐसे परिवार से हैं जहां किसी को भी कुष्ठरोग नहीं है। पर उनके सास-ससुर को कुष्ठ रोग था। शादी के बाद बेटे को माता-पिता से दूर करने के बजाए इन्होंने पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना शुरू किया और आज अपने सास-ससुर की चहेती बनी हुई हैं।

2010 में मिली थी रोजगार शुरू करने की मदद

कुष्ठ रोगियों के लिए काम करने वाली संस्था सहयोग कुष्ठ निवारण संघ के प्रदेश अध्यक्ष सुदामा सारंग गायधाने के मुताबिक कुष्ठ रोगियों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए इन्हें स्वरोजगार से जुड़ने के लिए आर्थिक मदद की जाती है। हीरा, सरिता और रानी को जब 2010-11 में मदद मिली थी तो यकीन नहीं था कि तीनों मिलकर इस तरह से अपने पैरों पर खड़ी हो जाएंगी। इस साल भी मध्य प्रदेश से 100 लोगों को मदद के लिए चुना गया है।

जिस गांव ने निकाला वहीं दिलाया मान

हीरा भंडारी की मां भागाबाई को जब कुष्ठ हुआ तो गांव से उन्हें बाहर निकाल दिया। इंदौर आकर भिक्षावृत्ति कर भागाबाई ने बेटी हीरा का पालन पोषण किया। जब हीरा बड़ी हुई तो अपने गांव जाने लगी। वहां लोगों को विश्वास दिलाया कि कुष्ठ रोग साथ रहने से नहीं फैलता। धीरे-धीरे गांव वालों की सोच बदलने लगी और एक दिन अपनी मां को उसी गांव में ले गई और उसी परिवार के साथ एक ही छत के नीचे ठहराकर मां का सम्मान उन्हें फिर लौटाया।