पति के न रहने पर जब रिश्तेदारों ने भी साथ छोड़ दिया तो एक मां ने अपनी मेहनत और हौसले के बल पर बेटी की परवरिश कर उसे पढ़ाया लिखाया। बेटी ने भी पूरी जी-जान से मां की सेवा की। इस काम में उसका साथ दिया पड़ोसियों ने। बेटी का अपनी से इतना लगाव था कि उसने सामाजिक मान्यताओं को दरकिनार करते हुए मां को मुखाग्नि भी दी। यह पूरी कहानी है रामबाग, तिलकपथ पर रहने वाले पठारे परिवार की।

उदयप्रताप सिंह. इंदौर

आज समाज में रिश्ते की डोर इतनी नाजुक हो चुकी है कि छोटी-छोटी बातों में रिश्ते बिखर जाते हैं। आए दिन परिवार के टूटने व रिश्तों के तार-तार होने की घटनाएं सामने आती रहती है। इसके बाद भी समाज में ऐसे कई लोग हैं, जो न सिर्फ अपने रिश्तों के प्रति समर्पित हैं, बल्कि उनके लिए रिश्ते ही सबकुछ है। ऐसा ही मजबूत रिश्ता एक मां का उसकी बेटी के साथ था। तिलकपथ पर पहाड़िया कॉम्प्लेक्स में रहने वाले पठारे परिवार में एक मां-बेटी से जब रिश्तेदारों ने दूरी बना ली तो इस दुनिया में मां-बेटी ही एक-दूसरे का सहारा बनी रही। अंतिम समय तक बेटी ने अपना फर्ज निभाते हुए मां की सेवा की।

रिश्तेदारों ने भी छोड़ा तो मां ने नौकरी शुरू की

पहाड़िया कॉम्प्लेक्स में रहने वाली जयश्री पठारे 30 वर्ष पूर्व अपने माता-पिता के साथ शेगांव महाराष्ट्र से इंदौर आई थी। इनके पिता विश्वासराव पठारे महाराष्ट्र के कांबी गांव के जागीरदार हुआ करते थे। 20 साल पहले इनके पिताजी का निधन होने के बाद रिश्तेदारों ने साथ देने की बजाय इनसे पल्ला झाड़ लिया। परिवार की पैतृक संपत्ति पर भी इन्हें अधिकार नहीं मिल सका। ऐसे में विश्वासराव की पत्नी लीलाबाई पठारे ने नौकरी कर अपना व बेटी का पालन-पोषण करने का रास्ता अपनाया।

एमटीएच व एमवॉय हॉस्पिटल में नर्स रही लीलाबाई

लीलाबाई की एक ही बेटी है जयश्री। उन्होंने बेटी के पालन पोषण के लिए नर्स की नौकरी की। लंबे समय तक वो चाचा नेहरु हॉस्पिटल में इंचार्ज सिस्टर के पद पर रही। इसके बाद एमटीएच हॉस्पिटल में भी पदस्थ रही। उनके कार्य व कर्तव्यनिष्ठा का लोहा एमवाय हॉस्पिटल के कई वरिष्ठ डॉक्टर आज भी मानते हैं। उनके त्याग व समर्पण के कारण ही कई मरीज उनके रिटायर होने के बाद भी दूर-दूर के शहरों से जब कभी इंदौर आते थे तो उनसे जरूर मिलते थे।

मां की सेवा के लिए बेटी ने नहीं की शादी

लीलाबाई ने बेटी जयश्री को बेहतर एजुकेशन दी। बेटी ने एमए सोशियोलॉजी की डिग्री भी हासिल की। लीलाबाई जयश्री की शादी करना चाहती थी लेकिन बेटी शादी के लिए तैयार नहीं हुई। जयश्री अपनी मां को अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी, इस कारण उसने शादी के बाद अपना घर बसाने का इरादा ही टाल दिया। जयश्री 40 साल तक मां की सेवा में निरंतर लगी रही। 30 मार्च को मां की मौत के बाद अब जयश्री की जिंदगी में वीरानी छा गई है।

सारे धार्मिक स्थलों के दर्शन कराए बेटी ने

जयश्री ने अपनी मां को उनके जीवन काल में ही जगन्नाथपुरी, द्वारकापुरी, वैष्णोदेवी जैसे कई तीर्थ स्थलों के दर्शन करवाए। जयश्री के त्याग व बलिदान का कायल पहाड़िया कॉम्प्लेक्स में रहने वाला हर परिवार है। ये लोग मां के प्रति बेटी का यह समर्पण देखकर हतप्रभ रह जाते थे।

अब नौकरी व सोशल सर्विस से जुड़ेगी बेटी

लीलाबाई 1990 में नर्स के पद से रिटायर हुई। इसके बाद मां-बेटी का गुजारा पेंशन से ही हो रहा था। बेटी भी अभी तक कोई नौकरी नहीं कर रही थी। ऐसे में जयश्री पर अब आर्थिक संकट आ पड़ा है। अब वह नौकरी करने व सोशल सर्विस सेक्टर में काम करने का प्रयास कर रही है।

पड़ोसियों से जुड़ा है परिवार जैसा रिश्ता

जयश्री और उनकी मां से रिश्तेदार तो दूरी बना चुके थे। ऐसे में पहाड़िया कॉम्प्लेक्स के 12 परिवार से ही उनके रिश्तेदारों जैसे संबंध बन गए। लीलाबाई नर्स थी, इस कारण यहां रहने वाले कई परिवारों के बच्चों का जन्म एमटीएच हॉस्पिटल में उनके हाथों ही हुआ। इस वजह से यहां के अधिकांश परिवारों के बच्चे व बड़े उन्हें प्यार से आई ही कहते थे। जयश्री जब छोटी थी तो लीलाबाई इन पड़ोसियों के पास ही उसे छोड़कर नौकरी पर जाती थी। अब लीलाबाई के न रहने पर यहां के लोग ही जयश्री का ख्याल रख रहे हैं। लीलाबाई के अंतिम संस्कार के बाद पड़ोसी ही उनके क्रियाकर्म में सहयोग कर रहे हैं। रिश्तेदारों में भी सिर्फ जयश्री के ननिहाल पक्ष से ही इक्का-दुक्का लोग आए हैं।

...मां का अंतिम संस्कार का निर्णय लिया

जयश्री ने अपनी मां को कभी भी बेटा नहीं होने का अफसोस नहीं होने दिया। वे हर पल मां की सेवा में जुटी रही और उनकी बीमारी और अन्य मौकों पर सदा उनके साथ खड़ी रही। उन्हें कहीं भी लाना या ले जाना हो तो वो हमेशा आगे रही। यही वजह है कि मां की मृत्यु होने पर उसने उनके अंतिम संस्कार का निर्णय लिया और रामबाग मुक्ति धाम में उन्हें मुखाग्नि दी। आमतौर पर सामाजिक मान्यताओं व मर्यादाओं के कारण महिलाओं को अंतिम संस्कार में शामिल नहीं किया जाता है। न हीं उन्हें मुखग्नि देने का मौका दिया जाता है। जानकारों के मुताबिक मराठी समाज में अब यह बदलाव देखने को मिल रहा है। कुछ परिवारों में माता-पिता के न रहने पर बेटी के मुखाग्नि देने का मामला सामने आया है। यही वजह है कि जयश्री ने ही अपनी मां का अंतिम संस्कार किया।

पड़ोसी करेंगे जयश्री की शादी व नौकरी के लिए प्रयास

मां की सेवा करने के कारण जयश्री ने अभी तक शादी नहीं की। अब पहाड़िया कॉम्प्लेक्स में रहने वाले लोगों का कहना है कि जयश्री उनकी बेटी की तरह है। अब वे ही जयश्री की शादी के लिए लड़का तलाशने का प्रयास करेंगे। उसकी नौकरी के लिए भी पड़ोसी प्रयास कर रहे हैं। फिलहाल जयश्री की मित्र ज्योत्सना लाड़, जो पेशे से योगा टीचर है, वो भी जयश्री की मदद कर रही हैं।

मां की सेवा के लिए शादी नहीं की

मां के जीते जी मैंने ही उनकी सेवा की। उन्हें कभी बेटे की कमी नहीं खलने दी। मैंने उन्हें कई धार्मिक स्थलों की यात्रा करवाई। यही वजह है कि मैंने ही उनके अंतिम संस्कार का निर्णय लिया। मां को अकेला नहीं छोड़ना था, इस कारण मैंने अभी तक शादी नहीं की। अब मैं सोशल सर्विस व नौकरी करूंगी। यदि कोई अच्छा रिश्ता मिला तो ही शादी करूंगी। मुझे पड़ोसियों का काफी सपोर्ट मिला।

- जयश्री पठारे