गौतमपुरा। दो विरोधी दल आमने-सामने, उनके हाथ में आग के गोले और हार-जीत का सीधा-सीधा निर्णय। कोई कूटनीति नहीं, कोई राजनीति नहीं, बस योद्धाओं की रणनीति। एक बात जो सबसे अलग है कि पहले लड़े जाने वाले युद्ध सूर्यास्त के बाद खत्म हो जाते थे और ये सूर्यास्त के बाद अंधेरा गहराने के बाद शुरू होता है... ये है हिंगोट युद्ध।

इंदौर जिले के गौतमपुरा में परंपरागत रूप से चले आ रहे इस युद्ध के शुरू होने की तारीख का कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता है लेकिन दीपावली के अगले दिन पड़वा पर यहां के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी हिंगोट युद्ध का हिस्सा बनते चले आ रहे हैं।

1984 में जब दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा की अगुआई में तालकटोरा स्टेडियम में मालवा उत्सव के दौरान इसे खेला गया, तब से यह देशभर में ख्यात हो गया। इस साल भी इस परंपरा को निभाने की पूरी तैयारी है। प्रशासन ने भी मैदान व्यवस्थित करवाना शुरू कर दिया। मैदान में बिजली, पानी और चिकित्सा टीम का भी इंतजाम किया जा रहा है।

तुर्रा और कलंगी के बीच घमासान

हिंगोट में दो दल क्रमश: तुर्रा (गौतमपुरा) और कलंगी (रूणजी) आपस में युद्ध लड़ते हैं। जांबाज योद्धा अपनी जान की परवाह किए बिना एक-दूसरे पर जलते हिंगोट (तीर) फेंकते हैं। इस खेल में जख्मी होने वालों की संख्या बढ़ने के बाद इस पर हाई कोर्ट में याचिका लगी थी। यह मामला अभी लंबित है। इसके बाद से कुछ वर्षों से प्रशासन सजग है। फिर भी योद्धा अपनी जान की परवाह किए बिना इस परंपरा को कायम रखने के लिए सूर्यास्त होते ही मैदान में उतर आते हैं।

स्थानीय लोग तैयार करते हैं हिंगोट

अग्निबाण हिंगोट युद्ध को लेकर स्थानीय नागरिक पूरी तरह से तैयार हैं। इंगोरिया नामक पेड़ से तोड़ने के बाद युद्ध के लिए तैयार करने तक एक हिंगोट 22 प्रक्रिया से गुजरता है। नीबू के आकार का फल जो अंदर से खोखला और ऊपर से कठोर होता है, इसमें बारूद भरकर इसे तैयार किया जाता है। युद्ध शुरू होने पर इसमें आग लगाकर दुश्मन दल पर फेंका जाता है।

एक घंटा चलता है यह खतरनाक खेल

दोपहर होते ही तुर्रा और कलंगी दल के योद्धा अपने सिर पर हेलमेट व साफा पहनकर एक कंधे पर झोला और हाथ में बचाव के लिए ढाल व जलती हुई लकड़ी को लेकर ढोल-ढमाके के साथ नाचते-गाते मैदान की ओर चल पड़ेंगे। परंपरा अनुसार देवनारायण मंदिर पहुंचकर दर्शन करेंगे और फिर मैदान पर एकत्रित होंगे।

दोनों दल के योद्धा आमने-सामने खड़े होकर सूर्यास्त का इंतजार करेंगे। संकेत मिलते ही एक-दूसरे पर जलते हुए हिंगोट बरसाना शुरू कर देंगे। करीब एक घंटे तक यह खतरनाक खेल चलता है।

मंच से ऐलान के बाद इसे रोक दिया जाता है। इस खेल की अगुआई कर चुके गौतमपुरा के पूर्व कप्तानों से चर्चा करने पर पता चलता है कि दिनोदिन इसमें लोगों की भागीदारी बढ़ रही है। तमाम खतरों के बावजूद युवा पीढ़ी भी इसमें शिद्दत से भाग ले रही है। बब्बू सिंधी, खलीफा और अशोक राठौर कहते हैं कि हर बार जख्मी हुआ पर हिंगोट युद्ध लड़ने का मजा ही कुछ और है।

तब कम होते थे योद्धा

हमारे समय बहुत कम योद्धा मैदान में हुआ करते थे। अब इसकी लोकप्रियता बढ़ी है। देखकर अच्छा लगता है।

भंवरसिंह पहलवान, पूर्व कप्तान, हिंगोट युद्ध

25 हिंगोट ही होते थे फेंकने के लिए

हम जब मैदान पर लड़ाई के लिए पहुंचते थे, तब हमारे पास 25 हिंगोट होते थे जिन्हें फेंककर युद्ध करके घर पर आ जाते थे। उस समय दर्शकों की उपस्थिति कम होती थी।

देवीलाल खत्री, पूर्व कप्तान