सुमेधा पुराणिक चौरसिया, इंदौर। स्वच्छता में नंबर वन बनने के लिए जहां शहर में कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं, वहीं कुछ किमी दूर गांव पेडमी में यही काम सरकारी स्कूल के बच्चे स्वप्रेरणा से कर रहे हैं। ये स्वच्छता, स्वास्थ्य और पर्यावरण की जागरूकता के 'वाहक" बन गए हैं। शासकीय हाई स्कूल पेडमी, मिडिल स्कूल और प्राइमरी स्कूल में स्वच्छता मिशन के तहत मिसाल पेश की जा रही है। स्कूली बच्चों को देख ग्रामीणों के मुंह से अचानक यही निकलता है- अरे! सूरज और रानी आ रहे हैं, कहीं कचरा तो नहीं पड़ा।

पांचवीं कक्षा की रानी छोटी सी बाल्टी लेकर स्कूल आती है। छुट्टी के बाद या इंटरवल में मैदान में कहीं भी कचरा दिखा तो तुरंत बीनकर बाल्टी में डाल देती है। इसी तरह आठवीं और दसवीं में पढ़ने वाले विनोद, पवन, सुभाष, विधि, दिव्या, राहुल आदि कोई भी गांव की सड़क से गुजरते हैं तो लोग अपने आसपास कचरा या गंदगी हो तो घबराकर तुरंत उठाने लग जाते हैं। ग्रामीणों को पता है कि कचरा फैलाया तो बच्चे पंचायत और स्कूल में उनकी शिकायत कर देंगे।

स्कूल ने हर बच्चे को बनाया स्वच्छता का वाहक

स्कूल का हर बच्चा यूनिफॉर्म के साथ-साथ स्वच्छता के वाहक की पट्टी लगाकर निकलता है। स्कूल में पहली से दसवीं तक के विद्यार्थियों को स्वच्छता का वाहक बनाया गया है। इन्हें हर दिन अपने माता-पिता, परिजन, रिश्तेदार और पड़ोसियों को सफाई का ध्यान रखने की समझाइश देने वाली बातें बताई जाती हैं। बच्चे घर और गांव में लोगों को गंदगी और कचरा नहीं फेंकने और सजा का डर बताते हैं तो गांव में अपने आप गंदगी कम होती जा रही है।

बच्चे बनाते हैं डस्टबिन

पंचायत के उपसरपंच रमण बैरागी के मुताबिक गांव में बच्चों के डर से लोगों ने खुले में शौच जाना बंद कर दिया। कचरा इकट्ठा करके कचरा गाड़ी में फेंकते हैं। विद्यार्थी स्कूल और घर के लिए खुद डस्टबिन बनाते हैं। बक्से और गत्ते के टुकडों को जोड़कर छोटे डस्टबिन बनाकर हर कक्षा, ऑफिस और मैदान में रखते हैं। उस पर जागरूकता संदेश भी लिखते हैं।

सामाजिक उत्थान के लिए कर रहे जागरूक

स्कूल प्राचार्य लिली डाबर ने बताया पढ़ाई के साथ बच्चों में सामाजिक उत्थान की भावना भी जाग्रत कर रहे हैं ताकि उन्हें अपने स्कूल, घर और गांव की सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास हो। बच्चों की छोटी सी कोशिश से गांव में सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है। इसके लिए हमने बच्चों को माध्यम बनाया, क्योंकि बच्चों की बात सभी मानते हैं। बच्चे बड़ों को गलती बताते हैं तो उस गलती का अहसास ज्यादा होता है।