गौतमपुरा। दीप पर्व के अगले दिन गुरुवार को गोवर्धन पूजा के अवसर पर शहर में परंपरागत हिंगोट युद्ध का आयोजन किया गया। इस दौरान दोनों ओर से जमकर अग्निबाण चले। हिंगोट युद्ध के दौरान 20 से अधिक लोग घायल हुए।

सूर्यास्त के बाद अंधेरा गहराने के बाद शहर में रोमांचक हिंगोट युद्ध की शुरुआत हुई। पड़वा पर हिंगोट युद्ध देखने के लिए आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्‍या में लोग यहां पहुंचे थे।

उल्‍लेखनीय है कि 1984 में जब दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा की अगुआई में तालकटोरा स्टेडियम में मालवा उत्सव के दौरान इसे खेला गया, तब से यह देशभर में ख्यात हो गया।

क्‍या होता है हिंगोट युद्ध

हिंगोट में दो दल क्रमश: तुर्रा (गौतमपुरा) और कलंगी (रूणजी) आपस में युद्ध लड़ते हैं। जांबाज योद्धा अपनी जान की परवाह किए बिना एक-दूसरे पर जलते हिंगोट (तीर) फेंकते हैं। इस खेल में जख्मी होने वालों की संख्या बढ़ने के बाद इस पर हाई कोर्ट में याचिका लगी थी। यह मामला अभी लंबित है। इसके बाद से कुछ वर्षों से प्रशासन सजग रहता है। फिर भी योद्धा अपनी जान की परवाह किए बिना इस परंपरा को कायम रखने के लिए सूर्यास्त होते ही मैदान में उतर आते हैं।

स्थानीय लोग बनाते हैं हिंगोट

इंगोरिया नामक पेड़ से तोड़ने के बाद युद्ध के लिए तैयार करने तक एक हिंगोट 22 प्रक्रिया से गुजरता है। नीबू के आकार का फल जो अंदर से खोखला और ऊपर से कठोर होता है, इसमें बारूद भरकर इसे तैयार किया जाता है। युद्ध शुरू होने पर इसमें आग लगाकर दुश्मन दल पर फेंका जाता है।

एक घंटा चलता है यह खतरनाक खेल

दोपहर होते ही तुर्रा और कलंगी दल के योद्धा अपने सिर पर हेलमेट व साफा पहनकर एक कंधे पर झोला और हाथ में बचाव के लिए ढाल व जलती हुई लकड़ी को लेकर ढोल-ढमाके के साथ नाचते-गाते मैदान की ओर चल पड़ते हैं। परंपरा के अनुसार देवनारायण मंदिर पहुंचकर दर्शन के बाद सब लोग मैदान पर एकत्रित हुए।

सूर्यास्त के बाद संकेत मिलते ही दोनों दलों के प्रतियोगियों ने एक-दूसरे पर जलते हुए हिंगोट बरसाना शुरू कर दिए। इस दौरान 27 लोगों के घायल होने की जानकारी मिली है।