इंदौर। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा शंकर व्याख्यानमाला का आयोजन शनिवार, 22 सितंबर को रविंद्र नाट्यगृह में आयोजित किया गया। कार्यक्रम का विषय 'अहं ब्रम्हास्मि' अद्वैत का अनुभ महावाक्य था। कार्यक्रम की शुरुआत आचार्य शंकराचार्य के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुई। शंकर व्याख्यनमाला में सर्वप्रथम कर्नाटक संगीत की विख्यात गायिका विनया राजन और सैंधवी. एस ने आचार्य शंकर के विरचित स्त्रोंतो के गायन किया।

संस्कृति मंत्रालय के अपर मुख्य सचिव और आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता के न्यासी सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव ने कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए कहा कि, डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि आदि शंकर ने जो चार मठ दिए थे, वो जनतंत्र के चार वाक्य हैं। आज हम लोगों ने जो अनुभव वाक्य यानी अहं ब्रम्हास्मि माना जाता है उस पर चर्चा रखी है।

अद्वैत यानी किसी जाति, राष्ट्रीयता, किसी विशिष्ट वर्ग के लिए नहीं है, यह सभी अद्वैत सभी को एक समान माना जाता है। यहां किसी पहचान का मैं नहीं है, दूसरों से पृथक नहीं है। अद्वैत ऋषि की शैली है यह कोई कृति नहीं है। अस्तित्व वादियों का कहना यही था कि में हमेशा अन्य के मैदान में रहता हूं। अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ है। अंह का मतलब है कि कोई पराया नहीं है। हमारी परंपरा का तीव्र प्रतिकार इनके बीच उभरता है।

व्याख्यानमाला में आए भारतीय प्रबंध संस्थान बेंगलुरु के प्रोफेसर डॉ. बी. महादेवन ने कहा कि, यदि आप भगवान शंकर की शिक्षाओं को ग्रहण करते हैं तो आपकी जिंदगी में हर उस समस्या का समाधान हो सकता है, जिसके कारण आप दुखी रहते हैं। आप शिवानंद लहरी को पढ़िए आप देखेंगे जब पेड़ से कई बीज गिरते हैं तो वह कई जगहों पर जाते हैं और वहां पेड़ बनता है।

ठीक इसी तरह शंकर केरल में जन्में और उन्होंने देश भर में अपनी शिक्षा का प्रसार किया। हमारे देश में हिमालय है, लेकिन वो समुद्र के किनारे नहीं। कर्म ज्ञान और भक्ति पर ही शंकराचार्य हैं। जब में स्टूडेंट था आदि शंकराचार्य ने क्या कहा वो सब कुच पढ़ा वह लोगों को जोड़ने लिए हमेशा तत्पर रहे। वह ऐसे संत हुए हैं जो कहते हैं कॉपी न करें। वह एक ऐसे ब्रांड हैं, जिनके दिए गए ज्ञान पर आज हम फोकस कर रहे हैं।

अनुभव वाक्य अहं ब्रम्हास्मि पर काफी किताबें पढ़ते हों, परंतु यह ज्ञान से संबंधित विषय नहीं हैं यह अनुभव का विषय है। आप सोचते हैं वेदांत का वाक्य है। अहं ब्रम्हास्मि का अर्थ है। मैं ब्रह्माण हूं। यह बड़ी प्रतिभा है। कृष्ण कहते हैं दो प्रकार की प्रकृति परा प्रकृति अपरा प्रकृति होती है। शंकर कहते हैं मेरी प्रकृति हैं जगत, प्रलय, सब कुछ यहीं पर हो रहा है रही है और अद्वैत हमेशा समानता की बात करता है।

कार्यक्रम के अगले पड़ाव में प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु गोविंद देव गिरि जी ने शंकराचार्य जी के जीवन और अद्वैत वेदांत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, मंगलमूर्ति इंदौर वासियों को जो प्रसाद मिला है जो इस व्याख्यानमाला के रूप में मिला है। आपको भगवान गणेश की कृपा है। ये बात परम सत्य है। शंकराचार्य जी ने लोगों को समानता का पाठ पढ़ाया। शंकर मूलत दार्शिनिक ढंग से रखते हैं। वो तर्क संगत हैं।

उनके कर्मयोग को देखें जो कार्य वह 32 साल में कर गए हैं हम अनेक जन्म में नहीं कर सकते हैं। वह योग के महान वेद्त्ता थे। आदि शंकराचार्य ने कहा पहले मैं का अंत करो केवल मैं कौन हूं यह खोजो यह खोजने पर आपकी हर समस्या का समाधान हो जाएगा। आपकी समस्याओं का हल हल है विचार शंकर ने सिखाया कैसे विचार करें।