उदयप्रताप सिंह, इंदौर नईदुनिया। देश के सबसे साफ शहर इंदौर में नगर निगम के पायलेट प्रोजेक्ट के तहत प्लास्टिक के कचरे से डीजल बनाने का काम निजी कंपनी ने शुरू कर दिया है। फिलहाल प्लास्टिक से फर्नेस ऑइल तैयार किया जा रहा है। इसके बाद इसे रिफाइन करके डीजल तैयार किया जाएगा। अभी सैंपल के तौर पर तैयार किए गए डीजल को देश की प्रमुख पेट्रोलियम रिसर्च लैब में प्रमाणिकता के लिए भेजा गया है। रिसर्च लैब की रिपोर्ट आने के बाद नगर निगम व शहर के अन्य वाहनों में प्लास्टिक से बने डीजल का उपयोग शुरू हो सकेगा। फिलहाल 5 टन कचरे से 12 से 14 घंटे में ढाई हजार टन फर्नेस ऑइल तैयार हो रहा है। इस फर्नेस ऑइल का नमकीन बनाने व लोहा गलाने वाली इंडस्ट्री ईंधन के रूप में उपयोग कर रही हैं।

तीन माह में एक लाख लीटर फर्नेस ऑइल तैयार हुआ

नगर निगम ने मुंबई की ग्रीन अर्थ वेस्ट सॉल्यूशन कंपनी को प्लास्टिक के कचरे से डीजल बनाने का काम सौंपा है। कंपनी ने तीन माह पहले 5 टन प्लास्टिक क्षमता का सेटअप ट्रेंचिंग ग्राउंड में लगाया है, इसकी लागत करीब सवा करोड़ रुपए है। कंपनी निगम से 3 रुपए प्रति किलो में प्लास्टिक खरीद रही है। पिछले तीन महीने में प्लास्टिक के कचरे से करीब एक लाख लीटर फर्नेस ऑइल बना है। कंपनी को छह महीने के लिए प्रायलेट प्रोजेक्ट के रूप में ये सेटअप चलाने का जिम्मा दिया गया।

50 टन प्लास्टिक क्षमता वाले टेंडर जारी करेंगे

शहर के रहवासी इलाकों से अभी प्रतिदिन करीब 100 टन प्लास्टिक का कचरा आ रहा है। इसे रिसाइकल कर केक व सादे रूप में तैयार किया जा रहा है। निगम द्वारा जल्द ही 50 टन क्षमता वाले प्लांट के लिए टेंडर जारी किया जाएगा।

टेस्टिंग रिपोर्ट का इंतजार

प्लांट में तैयार डीजल को टेस्टिंग के लिए देहरादून के पेट्रोलियम रिसर्च इंस्टीटयूट, हैदराबाद की वैम्ता लैब और दिल्ली के श्रीराम रिसर्च इंस्टीटयूट में 15 से 20 दिन पहले भेजा है। इन संस्थानों से प्रमाणिक रिपोर्ट आने के बाद इस डीजल का वाहनों में उपयोग शुरू हो सकेगा।

600 डिग्री तापमान पर तैयार होता है डीजल

प्लास्टिक को रिएक्टर में डालकर उसे 500 से 600 डिग्री तापमान पर गर्म किया जाता है। शुरुआत में 3 घंटे तक बाजार से खरीदे गए डीजल के माध्यम से बर्नर चलाना पड़ता है। तीन घंटे में गर्म हो रहे प्लास्टिक से वाष्प बनना शुरू हो जाती है और बाकी मटेरियल काले कार्बन के रूप में जमा हो जाता है। गर्म वाष्प एक कंडेंसर में जमा होती है और ऑइल के रूप में तैयार हो जाती है। इसके अलावा कुछ गैसोलिन भी अलग टैंक में जमा होती है। इस गैस से फिर प्लांट के बर्नर चलाए जाते हैं। 5 टन प्लास्टिक के कचरे को रिसाइकल होकर डीजल बनने में करीब 12 से 14 घंटे का समय लगता है।

अभी 5 टन प्लास्टिक के कचरे से प्रतिदिन ढाई हजार लीटर और तीन माह में अब तक एक लाख लीटर फर्नेस ऑइल तैयार किया है। देश के तीन प्रमुख पेट्रोलियम रिसर्च संस्थानों को भेजे सैंपल की रिपोर्ट आने के बाद डीजल बनाने का काम शुरू होगा। कंपनी इस डीजल को अन्य वाहन चालकों को बेच सकेगी। निगम भी अपने वाहनों में यह डीजल इस्तेमाल कर सकेगा। चुनाव खत्म होने के बाद हम 50 टन क्षमता के ऐसे प्लांट के लिए ग्लोबल टेंडर जारी करेंगे। -असद वारसी, कंसल्टेंट, स्वच्छ भारत मिशन, नगर निगम, इंदौर