रामनाथ मुटकुळे, इंदौर। नवरात्र की घटस्थापना के पहले दीवारों पर बनने वाली मालवा शैली में चित्र बनाने की 200 साल पुरानी परंपरा विलुप्त होने के कगार पर है। राजवाड़ा स्थित मंदिरों की दीवारों पर बनाए जाने वाले देवी- देवताओं, युद्ध, धार्मिक, बरात, दूल्हा- दुल्हन के चित्र अब नजर नहीं आते, लेकिन होलकर राजवंश के राजगुरु के पैतृक निवास पर यह परंपरा अभी भी जीवित है। मालवा शैली के कलाकारों ने गत दिनों भित्ति चित्रों और शुभता को ताजा रंगों से दीवारों पर उकेरा।

राजवाड़ा परिसर में यह परंपरा 34 साल पहले तक जिंदा थी। यह हैं उज्जैन के अनिल धूलजी शर्मा (चित्रकार)। तीन पीढ़ियों से विरासत में मिली मालवा चित्रण शैली के चित्रों को जीवंत बनाए रखने की कोशिश में जुटे हैं। तीस साल से इस काम में जुटे अनिल बताते हैं पुराने समय में कच्चे घर होते थे, उस समय मांगलिक और धार्मिक अवसरों पर दीवारों पर शुभता दर्शाते हुए चित्र बनवाए जाते थे।

राजवाड़ा की दीवारों पर चित्र बनवाने के लिए दादाजी को बुलाया जाता था। उनके साथ पिता धूल जी आते थे। यह परंपरा वर्ष 1984 में राजवाड़ा जलने तक जारी रही। उसके बाद अब वहां नहीं बनाए जाते हैं, लेकिन राजोपाध्याय परिवार के घर पर वे आज भी चित्र बनाने इंदौर आते हैं। इन चित्रों की कीमत उकेरी गई तस्वीरों की आंखें देखकर तय होती थी।

मालवा शैली यानी एक चश्मी चित्र

होलकर राजवंश के राजगुरु के वंशज डॉ. विजय राजोपाध्याय बताते हैं उस वक्त मंदिर की एक दीवार पर उकेरी गई यह चित्र किसी म्यूरल की तरह लगती थी। इसमें देवी-देवताओं के साथ राजा के हाथी में बैठे हुए दशहरे के जुलूस के लिए निकलना, युद्ध मैदान की तस्वीरें आदि उकेरी जाती थी। पूरी दीवार ऐसे ही रंग बिरंगे चित्रों से भरी होती थी। मालवा चित्रण शैली की खासियत यह है कि यह एक चश्मी होती थी....यानी चेहरे का एक ही हिस्सा दिखता था। होलकरों के समय से पीपलीबाजार स्थित हमारे पैतृक घर पर यह परंपरा आज भी जीवित है। नारियल के खोल में वाटर कलर से धूलजी और अब उनके बेटे अनिल देवी देवताओं के चित्रों के साथ शिव पार्वती का भांग छानते हुए चित्र बनाते हैं।

खास बात यह है कि इन चित्रों को उकेरने के लिए वे दीवार पर कोई लाइन नहीं खींचते हैं बल्कि सीधे ही रंग भरते हैं। अनिल बताते हैं उज्जैन की गढ़ कालिका और हरसिद्धि माता मंदिरों में भी ये चित्र घट स्थापना के पूर्व बनवाए जाते थे, लेकिन अब सभी दूर पक्के घर और मंदिरों में मार्बल का काम हो जाने से इन चित्रों की पूछपरख समाप्त हो गई है। इस कला ने पिता धूलजी को मालव रत्न सम्मान सहित अनेक पुरस्कार व सम्मान दिलवाया लेकिन इसके सहारे रोजगार जुटाना मुश्किल हो रहा है। इसके चलते उन्होंने मार्बल पर काम करना सीखा।