इंदौर, मुंबई। जाने-माने सितार वादक अब्दुल हलीम जफर खान (88) का बुधवार को निधन हो गया। वह 'सितार त्रयी' के आखिरी जीवित कलाकार थे जिसमें पंडित रविशंकर, उस्ताद विलायत खान भी शामिल थे। खान इंदौर घराने के कलाकार थे और 'जफरखानी बाज' शैली के लिए पहचाने जाते थे। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था। उनका जन्म जावरा (मप्र) में हुआ था।

'जफरखानी बाज' बनी खां साहब की पहचान

सितार वादक अब्दुल हलीम जफर खान सितार जगत के जानेमाने कलाकार थे। इस क्षेत्र के सबसे बड़े कलाकारों में पं. रविशंकर, पं. निखिल बैनर्जी, उस्ताद विलायत खां, उस्ताद मुश्ताक अली खान जैसे पांच सितारों में से वे भी एक थे। उनकी पहचान 'जफरखानी बाज' शैली थी। इस शैली ने उन्हें दूसरों से अलग पहचान बनाने में कामयाबी दी।

इस शैली को उन्होंने अपने शागिर्दों को भी सिखाया। उनके दो शार्गिद खास हैं। एक उनके पुत्र जुनैन ए. खान और दूसरे कोलकाता के हरशंकर भट्टाचार्य हैं। उनसे मुलाकात का अवसर 1984- 85 के दौरान खैरागढ़ इंदिरा कला विश्वविद्यालय में उनको डीलिट की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

उनको यह उपाधि यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर पं. विमलेंदु मुखर्जी के हाथो प्रदान की गई थी। पं. मुखर्जी हमारे गुरु थे। उनको सितार जगत के कई सम्मान मिले। यह सम्मान उनके हुनर की कहानी कहते हैं। खां साहब के निधन से संगीत जगत जो हानि हुई है उसकी भरपाई संभव नहीं है। - पं. असीम चौधरी, सितारवादक