रामकृष्ण मुले, इंदौर। अच्छी सेहत के लिए अच्छी नींद जरूरी है लेकिन क्या यह संभव है कि कोई सालों से लेटकर सोया ही नहीं हो तो इस सवाल का जवाब जरा मुश्किल है। इस सवाल का जवाब श्वेतांबर जैन समाज के स्थानकवासी परंपरा के संत शीतलराज महाराज हैं। वे अपने 50 साल के साधु जीवन में पिछले 48 साल से आड़ा आसन त्यागी हैं। 72 वर्षीय संत इस दौरान कभी एक दिन या कुछ मिनिट भी कभी लेटकर नहीं सोए, जब भी सोए तो खड़े होकर या कुर्सी पर बैठे-बैठ ही सोए हैं।

आड़ासन का त्याग करने वाले जैन समाज के वर्तमान में एकमात्र और 300 साल के इतिहास में दूसरे संत हैं। उनकी इस आड़ासन नहीं लेने की कठोर साधना को नमन करने वाले देशभर में हजारों समाजजन हैं, लेकिन उनका अनुकरण करने वाला कोई नहीं। इसके चलते उन्होंने आज तक किसी को दीक्षा नहीं दी ना ही उनका कोई शिष्य है। इंदौर में आगामी चातुर्मास के लिए इंदौर आए शीतलराज महाराज कहते हैं कि 22 साल की उम्र में 50 वर्ष पहले वैराग्य धारण किया।

दीक्षा की प्रेरणा जोधपुर में आचार्य हस्तीमलजी से मिली। पिता नहीं चाहते थे कि दीक्षा लूं, लेकिन उन्हें किसी तरह मनाया। इसके बाद परिवार के लोग चाहते थे कि बहन की शादी हो जाए, इसलिए बहन की शादी रात में जिस मंडप में हुई उसी में सुबह मैंने दीक्षा ली। साधु जीवन का नाम ही त्याग है इसलिए आड़ासन व्रत धारण किया। मुझसे पहले आचार्य जयमल के नाम की जानकारी है जिन्होंने आड़ासन व्रत धारण किया था।

शहर में होगा उनका चातुर्मास

अखिल भारतीय श्वेतांबर जैन महासंघ के सचिव योगेंद्र सांड बताते है कि उनका आगमन शहर में चातुर्मास के लिए हुआ है। उनका चातुर्मास पोरवाल भवन जंगमपुरा में होगा। अपनी धर्म-साधना के लिए उनकी खास पहचान है। आड़ासन त्याग का व्रत पिछले 48 सालों से उन्होंने धारण किया हुआ है।

26 साल से सूर्य अतापना और एकासन व्रत का पालन

ह पिछले 26 साल से शीतलराज महाराज हर दिन सूर्य अतापना लेते हैं। यानी दोपहर 12 से 2 बजे का समय छत पर गुजारते हैं। ह प्रतिदिन दोपहर 12 से 2 बजे और शाम 7 से रात 9 बजे और सोमवार और गुरुवार को पूरे दिन मौन साधना करते है। ह पिछले 18 साल से एकासन व्रत का पालन कर रहे हैं। इसमें एक समय भोजन ग्रहण करते हैं। अपने साथ हमेशा एक चादर और चोलपट्टा रखते हैं चाहे कितनी ही ठंड क्यों न हो।

इस तरह की साधना करने वाले एकमात्र संत

अपने साधु जीवन में एक भी दिन बिना लेटे सोने वाले वे श्वेतांबर जैन समाज के एकमात्र संत हैं। उनका समग्र जीवन त्याग, वैराग्य व संयम साधना से भरा है। उन्होंने किसी को आज तक दीक्षा नहीं दी क्योंकि उनका अनुकरण करना आसान नहीं है। - महेश डाकोलिया, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, ऑल इंडिया श्वेतांबर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस