इंदौर, नईदुनिया रिपोर्टर। जिंदगी में हम यूं तो कई लोगों से मिलते हैं। इनमें से कुछ को भूल जाते हैं और कुछ से खासे प्रभावित भी होते हैं, मगर ऐसा बहुत कम होता है कि किसी शख्स की मर्मस्पर्शी दास्तां सुनकर हाथ खुद-ब-खुद उसे सैल्यूट करने के लिए उठ जाएं। शनिवार को 'टेड एक्स टॉक' के तहत ऐसी ही एक अनूठी शख्सियत जोयिता मंडल से मुलाकात हुई। पेश है उनके अद्वितीय संघर्ष की कहानी, उन्हीं की जुबानी ...

बचपन से मैं लड़के के बजाय लड़की के रूप में खुद को ज्यादा कंफर्टेबल फील करती थी। इसलिए एक बार दुर्गा पूजा में मैंने लड़कियों की तरह खूब सज-धजकर फेस्टिवल एंजॉय किया। मगर घर आई तो मां-बाप बिफर उठे। इतनी लानत-मलानत हुई कि चार दिन तक बीमार रही। डॉक्टर को भी उन्होंने इस डर से नहीं दिखाया कि कहीं मेरे ट्रांसजेंडर होने का राज न खुल जाए। खैर ... स्कूल के बाद कॉलेज गई तो वहां भी हंसी का पात्र बन गई। जब ताने बर्दाश्त के बाहर हो गए तो कॉलेज छोड़ दिया। कुछ ही अरसे बाद घरवालों के व्यवहार से परेशान होकर घर भी छोड़ना पड़ा। तकदीर दिसनापुर ले गई, वहां कई दिन फुटपाथ पर कटे, फिर किन्नर घर के डेरा का पता चला। उनके साथ जिंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ। पढ़ी-लिखी थी, इसलिए एक संस्था शुरू की जो किन्नर समाज के भले के लिए काम करती है।

इस बीच सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के तहत हमें 'थर्ड जेंडर' मान लिया गया। उस फैसले को हम किसी पवित्र किताब की तरह हर वक्त साथ रखते हैं। इसके बाद मैं समाज सेवा से जुड़ गई। अब किन्नर के साथ-साथ उन औरतों के लिए भी काम कर रही हूं, जिन्हें दिन में लोग हिकारत की निगाह से देखते हैं, लेकिन रात में उन्हीं के पास छुप-छुपकर जाते हैं। वृद्धाश्रम बनवा कर बुजुर्गों की सेवा कर रही हूं, क्योंकि मुझे बचपन में मां-बाप का प्यार नहीं मिला। इनको ही अपने माता-पिता की तरह मानती हूं।

इस बीच मैंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की और 8 जुलाई 2017 को लोक अदालत की पहली ट्रांसजेंडर जज बनी। जिस शहर में कभी कोई मुझे भीख भी नहीं देता, उस शहर में जज के रूप सफेद कार में बैठकर जब निकलती हूं तो अभिवादन करने वालों की लाइन लग जाती है। ये देखकर अच्छा भी लगता है और ये भी सोचती हूं कि ऐसा ही प्यार और सम्मान मेरे जैसे हर इंसान को मिलना चाहिए। इसलिए अब मेरी कोशिश ये है कि समाज में बाकी किन्नारों को भी सम्मानजनक स्थान दिलाने की है। गुजारिश है कि हमें भी दूसरे लोगों की तरह मौके दिए जाएं। हम भी बहुत अच्छे जज, वकील, इंजीनियर, प्रोफेसर, साइंटिस्ट, डॉक्टर्स बन सकते हैं। क्योंकि बाकी कुछ होने से पहले हम लोग इंसान हैं। क्या बिडंबना है कि हम ट्रांसजेंडर को शुभ मानते हैं, उनकी दुआएं भी लेते हैं मगर इज्जत नहीं देते हैं।

कुआं खोदा तो तुम्हें उसी में गाड़ देंगे

जल-जन जोड़ो आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह ने टेड एक्स टॉक के तहत बुंदेलखंड के ऐसे गांवों की कहानी साझा की, जहां पानी की परेशानी से बचने के लिए महिलाओं ने ऐसी सार्थक पहल की कि पुरुष सत्तावादी समाज के चेहरे का पानी उतर गया। श्री सिंह ने बताया कि पानी संबंधी समस्याओं के निदान को लेकर हुए सर्वे में पाया गया कि पानी की किल्लत से सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं को होती है। इसलिए हमने पानी के नियंत्रण की जिम्मेदारी महिलाओं के हाथ में दी। करीब 200 गांवों में जल सहेलियों के नेतृत्व में महिला पानी पंचायतें बनाई गईं।

मगर जब महिलाओं ने कुएं और तालाब बनाने की बात की तो पुरुष प्रधान समाज उनके खिलाफ हो गया। 'मोटो" गांव की कई महिलाओं को तो ये धमकी भी मिली कि 'कुआं खोदा तो तुम्हें उसी में गाड़ देंगे"। ऐसे हालात में भी महिलाओं ने हार नहीं मानी। वो घर के काम भी करती और बचे समय में मिल-जुलकर कुएं खोदती। मगर जब कुएं खुद गए तो पुरुष उसमें खेत सींचने के लिए मोटर लगाने पहुंच गए। मगर महिलाओं ने उनसे लोहा लिया जलस्त्रोतों की पहरेदारी कर पानी बचाया। ये सिलसिला कई सालों से निरंतर जारी है।

क्लीन पॉलिटिकल फंडिंग से जीते जिग्नेश

बिलाल जैदी ने बताया कि पॉलिटिक्स में गंदगी इसलिए है कि चुनाव के पहले नेता लॉबी करने वालों से फंडिंग लेते हैं और फिर चुनाव जीतने के बाद उन्हें उपकृत करते हैं। इसलिए हमने 'क्लीन पॉलिटिकल फंडिंग" अभियान का आगाज गुजरात में हुए हालिया चुनावों से किया। हमने सोशल मीडिया पर जिग्नेश मेवाणी के बारे में बताकर उन्हें चुनाव लड़ने के लिए आम लोगों से सहयोग की अपील की। 15 दिन में ही 22 लाख रुपए जमा हो गए और जिग्नेश चुनाव जीत भी गए। अब वो किसी लॉबी के दबाव में नहीं हैं और खुलकर काम कर पा रहे हैं।

गढ़ी 'स्मार्ट' की नई परिभाषा

एक अन्य वक्ता फ्रेशिया ने बताया कि एक दिन मेरा कंप्यूटर खराब हो गया। मैंने छोटे भाई से यूं ही पूछ लिया कि तू इसे ठीक कर सकता है क्या? और वाकई उसने ठीक कर दिया। मैंने पूछा ये कैसे किया? उसका जवाब था गूगल से ... उस दिन से मैं भी गूगल फ्रेंडली हो गई। अपना यू-ट्यूब चैनल बनाया जिसे कमाल का रिस्पांस मिला। मैं स्मार्टनेस को रीडिफाइन कर रही हूं। मेरे लिए एस सेफर, एम मल्टीडायमेंशनल, ए आस्क द राइट क्वेश्चन, आर रीड और टी टाइम का सिंबल है। इस फॉर्मूले पर चलने वाले शख्स की सफलता पक्की है।

यूटिलाइज करें दिन के 86400 सेकंड्स

21 साल की उम्र में यूएन एंबेसडर ऑफ यंग आंत्रप्रेन्योर्स बनने वाले राज शमानी ने कहा कि एक दिन में इंसान के पास 86400 सेकंड होते हैं। जो इनका सही इस्तेमाल कर लेते हैं आगे निकल जाते हैं और जो इन्हें गंवाते हैं वो पीछे रह जाते हैं। इस दौर में गूगल पर जो बात तीन घंटों में सीखी जा सकती है, उसके लिए डिग्री के तीन साल क्यों खराब करें? क्योंकि दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है कि तीन साल बाद वो कोर्स ही आउटडेटेड हो जाएगा। दूसरी बात आप जैसा बनना चाहते हैं वैसे लोगों से मिलें। अगर आप अपनी फील्ड में बेस्ट बनना है तो उस फील्ड के बेस्ड लोगों से मिलें। 14 साल के कुणाल चांदीरमानी, प्रतीक उप्पल, कपिल जैन, देवल वर्मा और प्राची अग्रवाल ने भी अपने सक्सेस स्टोरीज शेयर कीं।