इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि। महिलाओं के लिए सबसे मुश्किल काम है समाज की सोच को चुनौती देना। समाज की महिलाओं के प्रति जो सोच है, अब वह पीछे छूट गई है। टोल नाके हमेशा वहां होने वाले झगड़ों के लिए जाने जाते रहे हैं। यहां पर कभी महिलाएं काम करने का सोच भी नहीं सकती थीं, लेकिन कुछ महिलाओं से इस सोच पर वार किया और समाज को बताया कि ऐसा कोई काम नहीं, जो उनके लिए मुश्किल है। टोल पर काम करने वाली महिलाओं में कई तो ऐसी हैं, जो कॉलेज में पढ़ रही हैं और टोल पर काम कर अपने परिवार को संबल भी दे रही हैं।

मैं तय कर चुकी थी

टोल नाके पर काम कर रहीं किरण शर्मा बताती हैं कि उन्होंने 12वीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है। ऐसे में नौकरी मिलना मुश्किल ही था, इसलिए मैंने टोल पर नौकरी करने की सोची। शुरुआत में लोगों ने उन्हें इस काम के लिए मना किया, लेकिन मैं तय कर चुकी थी कि मुझे यह काम करना है। अब किरण बखूबी नाके को संभाल रही हैं।

पढ़ाई के साथ काम भी

शीतल जोशी पढ़ाई के साथ टोल पर नौकरी भी कर रही हैं। समाज कुछ भी सोचे, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। शीतल कहती हैं कि यह खुद पर निर्भर होता है कि हम क्या और कैसे कर रहे हैं। आगे बढ़ना है तो पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। जब युवतियां बॉर्डर पर रहकर बंदूक चला रही हैं, मौत से लड़ रही हैं तो यह तो महज नाका है।

जो डरता है लोग उसे ही डराते हैं

एमकॉम की छात्रा सरिता श्रीवास कहती हैं कि जब बड़े हुए तो घर से यही सीख मिली थी कि जो डरता है, लोग उसे ही डराते हैं। मैं पुलिस में भर्ती होना चाहती हूं। एसआई की तैयारी कर रही हूं। मेरे परिवार ने कभी बंदिशों में नहीं रखा, खुलकर उड़ने की आजादी दी, इसका कभी गलत फायदा नहीं उठाया, मैं उड़ना चाहती हूं।

अब किसी को शिकायत नहीं

स्टूडेंट श्वेता रैकवार बताती हैं कि जो समाज अब यह सोचता है कि महिलाओं के लिए घर गृहस्थी ही उनकी असल जिंदगी है तो यह गलत है। शुरुआत में लगा था कि टोल पर काम करना महिलाओं की बस की बात नहीं है, लोगों ने भी विरोध किया, लेकिन मैं डटी रही, अब किसी को शिकायत नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर शुरू हुई पहल : देवास नाका स्थित टोल नाके के सुपरवाइजर अजय पांडे का कहना है कि आए दिन विवाद, लूट और टोल से निकलने वाले वाहन चालकों द्वारा रुपए न देने जैसे मामले आम हैं लेकिन कई टोल नाके जहां महिलाएं काम कर रही हैं, वहां विवाद नहीं रहे हैं। देवास नाका पर पिछले साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं को नौकरी देने की पहल हुई। अब यहां सुबह 8 से शाम 4 बजे तक की शिफ्ट में 12 महिलाएं काम करती हैं। महिलाओं ने समाज की सोच को बदलने का काम किया है।