जबलपुर, नईदुनिया रिपोर्टर। जरा-सी बात पर चीखते हुए नाराजगी जाहिर करना, घर में तोड़- फोड़ करना या फिर सुसाइड करने की धमकी देना। महज 9 से 15 साल के बच्चों की इन हरकतों से इन दिनों पैरेंट्स खासे परेशान हैं। शहर के मनोवैज्ञानिकों के पास बच्चों के बेवजह हिंसक होने और इमोशनल ब्लैकमेल करने के रोजाना केस पहुंच रहे हैं। इनमें से लगभग बच्चों के पैरेंट्स या तो वर्किंग है, या फिर वे फैमिली या हेल्थ प्रॉब्लम या सोशल सर्किल में ज्यादा बिजी होने की वजह से बच्चों को वक्त नहीं दे पा रहे हैं। बच्चे घर ही नहीं बाहर भी बेहद अग्रेसिव हो रहे हैं।

ये पैरेंट्स और दूसरे फैमिली मेंबर्स के साथ बदतमीजी से बात करते हैं। जिस चीज के लिए उन्हें मना किया जाता है वही करते हैं। देर रात तक जागना, इंटरनेट और मोबाइल पर ज्यादा वक्त गुजारना और रोकने पर गुस्सा करना बेहद कॉमन है। बहुत से बच्चे जरा-जरा सी बात पर खुद को कमरे में बंद कर लेते हैं। वे पैरेंट्स से बात करना बंद कर देते हैं। कुछ बच्चे बार-बार सोसाइट की ध्ामकी भी दे रहे हैं। पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों में उनका परफॉर्मेंस लगातार गिर रहा है।

यही है परफैक्ट उम

बच्चे को अगर 9 से 15 की उम्र के बीच नहीं संभाला गया तो इसके बाद उनके सुध्ारने की ग्रुजाइश कम हो जाती है। अगर आप चाहते हैं कि बच्चों में अच्छी आदत हो तो जरूरी है पैरेंट्स भी उन आदतों को फॉलों करे। कोई भी रूल सिर्फ बच्चों के लिए न बनाएं उसे खुद भी माने। क्वालिटी टाइम गुजारें और बच्चों की जासूसी न करें, बल्कि उनके साथ दोस्ताना व्यवहार करें। ताकि वे अपनी हर बात बिना हिचकिचाए आपसे शेयर कर सकें।

पैरेंट्स करा रहे हैं काउंसलिंग

बच्चों के हिंसक व्यवहार से परेशान पैरेंट्स अब काउंसलर की मदद ले रहे है। डॉ. मुकुल तिवारी का कहना है जिन बच्चों के पैरेंट्स कामकाजी हैं वे बच्चे ज्यादा एग्रेसिव हैं। पैरेट्स उनके व्यवहार से ना सिर्फ परेशान हैं, बल्कि गिरफ्त में आ रहे है। यहीं वजह है कि कुछ पैरेंट्स 5 से 7 सिटिंग लेने के बाद भी काउंसलिंग की मदद से ही बच्चों को हैंडल कर रहे है। मनोवैज्ञानिक डॉ. मुकेश चंगुलानी का कहना है कि बच्चे अगर 15 साल की एज तक डिसीप्लीन में रहना सीख लेते हैं तो वे आगे चलकर बेहद अच्छा परफॉर्म करते है।

हम पैरेंट्स को यही समझाते हैं कि उन्हें डांटकर नहीं , बल्कि प्यार से समझाकर ही सही रास्ते पर लाया जा सकता है। वर्किंग पैरेंट्स को इसके लिए ज्यादा मेहनत करनी होती है क्योंकि उनके बच्चों में एग्रेशन ज्यादा है और वे समय नहीं दे पाने के गिल्ट में कई बार खुद ही बच्चे को बिगाड़ देते हैं। बच्चे के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताकर इस समस्या से बचा जा सकता है।

मनोविशेषज्ञ के अनुसार-ये बातें हैं काम की

- सोते वक्त या देर रात मोबाइल या नेट का यूज नहीं करना है।

- रीडिंग हैबिट डेवलप करें।

- पैरेंट्स जितने भी थके या तनाव में हो, बच्चों पर अपना फ्रस्ट्रेशन ना निकालें।

- बच्चे की हर बात ध्यान से सुनें और अगर वो जिद करें तो उदाहरण देकर उसे समझाएं।

- दूसरी एक्टिविटी पर उसका ध्यान लगाएं और उस में खुद भी इंट्रेस्ट लें।

- बच्चों को कंट्रोल करने के लिए टीवी से केबल कनेक्शन हटाने जैसी भूल न करें, एंटरटेनमेंट उनके लिए जरुरी है और बेवजह की सख्ती बात बिगाड़ सकती है।

- बच्चा जो भी सवाल पूछे उसका जवाब दें, डांटकर चुप न कराएं।

- रुटीन लाइफ का टाइमटेबल बनाएं और उसे बच्चे के साथ खुद भी फॉलो करें।