जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य शसन और बिजली कंपनी के बीच के मामले में दखल से साफ इनकार करते हुए जनहित याचिका खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश हेमंत गुप्ता व जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की युगलपीठ ने साफ किया कि यदि सरल बिजली योजना और बकाया बिजली बिल माफी योजना के कारण भविष्य में उपभोक्ताओं पर बिजली के रेट बढ़ने का बोझ आएगा तो उसके खिलाफ विद्युत नियामक आयोग के समक्ष अपील का रास्ता खुला हुआ है। लिहाजा, यह मामला किसी भी तरह जनहित से न जुड़ा होने के कारण जनहित याचिका खारिज की जाती है। जनहित याचिकाकर्ता नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के प्रांताध्यक्ष डॉ.पीजी नाजपांडे की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने पक्ष रखा।

51 सौ करोड़ का बोझ बढ़ेगा-

अधिवक्ता ने दलील दी कि सरल बिजली योजना और बकाया बिजली बिल माफी योजना के कारण 5100 करोड़ का बोझ बढ़ेगा। राज्य ने बिजली कंपनी को पूर्व में भुगतान नहीं किया अतः इस बात की आशंका से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि इस राशि की वसूली भविष्य में सामान्य उपभोक्ताओं से बिजली के रेट बढ़ाकर की जा सकती है। बीपीएल व असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को लाभ पहुंचाने के नाम पर सरकार इस तरह आम जनता को परेशान नहीं कर सकती। विद्युत अधिनियम 2003 की धारा-65 के तहत वर्ग विशेष को छूट दिए जाने से पूर्व सरकार का दायित्व है कि वह राशि बिजली कंपनी में जमा करे, लेकिन ऐसा न करते हुए 1 जुलाई से योजना लागू कर दी गई।

सुप्रीम कोर्ट में देंगे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती

डॉ. नाजपांडे ने कहा कि विधानसभा चुनाव से पूर्व उठाया गया यह कदम मतदाताओं को लुभाकर राजनीतिक लाभ हासिल करने से भी जुड़ा होने के कारण चुनौती के योग्य है। 2003 में तत्कालीन दिग्विजय सरकार ने ऐसा ही किया था तब जनहित याचिका दायर की गई थी। उस समय चीफ जस्टिस राजारत्नम और जस्टिस दीपक मिश्रा की युगलपीठ ने सरकार को 100 करोड़ जमा करने निर्देश दिए थे। लिहाजा, हाईकोर्ट द्वारा जनहित याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की शरण ली जाएगी।