जबलपुर।

एक अशोक ही नहीं हर व्यक्ति दो स्तर पर जीवन जीता है। एक स्तर है अंतरंग, सहचरी और संतान की ऊष्मा और पारस्परिक विश्वास जीवन को अर्थ देते हैं। वहीं दूसरा स्तर बहिरंग, हारे हुए लोगों से जयजयकार सुनने की ललक और जो अंततः निरर्थक सिद्घ होती है। सम्राट अशोक की जीवन यात्रा को बखूबी मंच पर जीवंत किया मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के युवा कलाकारों ने। अवसर था तरंग ऑडिटोरियम में चल रहे मप्र नाट्य विद्यालय के 7वें सत्र समाप्ति नाट्य समारोह के चौथे दिन का। जहां नाटक सम्राट अशोक का मंचन किया गया। नाटक की विशेषता थी कि संवादों का उपयोग न के बराबर था आंगिक अभिनय को महत्व दिया गया। संगीत के साथ मनोभावों को बखूबी दिखाया गया। जिसने दर्शकों को बांधे रखा।

नाटक की खासियत-

नाम- सम्राट अशोक

लेखक- दया प्रकाश सिन्हा

निर्देशक- पार्थो बंदोपाध्याय

मंच निर्माण-सोनू विश्वकर्मा

वेशभूषा- सारिका भारती, श्रुति पांडे, संजय सिंह जादौन

प्रकाश- अनपू जोशी बंटी

मेकअप- मेघना पांचाल, जितेंद्र कुमार, विवेक नामदेव, ईशा पांडे

संगीत- शैलेंद्र मंडोड

मंच पर कलाकार- राधाकृष्णा नंद ब्रह्मा, अंकित दास, मेघना पांचाल, श्रुति पांडे, सौरभ सिंह परिहार, ज्ञानेंद्र यादव, ईशा पांडे, सारिका भारती, चेतना तिरदिया, विवेक नामदेव, दिनेश कुमार,शुभम बारी, जितेंद्र कुमार, भुवांशु शर्मा, अदिति लाहौटी, हर्ष प्रकाश, अरुण ठाकुर, रियांश तनेजा, सिद्घार्थ अवस्थी व अन्य कलाकारों ने अपने अभिनय वे खूब तालियां बटोरीं।

नाटक की कहानी-

नाटक में अशोक के सम्राट बनने की कहानी को दिखाया गया। उसके जीवन में कामशोक, चंडाशोक और धम्माशोक एक के बाद एक नहीं आए। वे तीनों उसे शरीर में एक साथ जीववन पर्यंत जीवित रहे। अपनी कुरूपता के लांछन को छिपाने के लिए वह अपने आपको देवानांपिय राजा पियदस्सी कहलाना पसंद करता था। कलिंग युद्घ में हुए रक्तपात से जनित अशोक के अंतर में पश्चाताप और भिक्खु समुद्र की हत्या उपरांत उसके मन में बुद्घ के प्रति आस्था का सृजन होता है। विश्व कल्याण व शांति के लिए दान-पुण्य करते हुए अशोक पूरा राज्यकोष खाली कर देता है। इसी के चलते वैश्विक संकट को भांपकर महामंत्री राधा गुप्त अशोक को राजहित में बंदी बना लेते हैं।