- ज्यादातर स्कूलों में नहीं लगते खेल के पीरियड, दीवारों की शोभा बढ़ा रहे खेल कैलेंडर

- 178 स्कूलों में सिर्फ 20 में ही खेल शिक्षक, कहीं खाली छोड़ रहे पीरियड, कहीं कर देते हैं छुट्टी

- स्कूलों के कैलेंडर में अलग से खेल का 40 मिनिट का पीरियड है निर्धारित

जबलपुर। पढ़ाई के बोझ से कुछ हद तक राहत देने के साथ ही छात्रों को शारीरिक रूप से फिट रखने के उद्देश्य से सरकारी स्कूलों में दो खेल पीरियड लगाना अनिवार्य किया गया है। स्कूल शिक्षा विभाग ने शैक्षणिक कैलेंडर में 40-40 मिनट के दो खेल पीरियड भी निर्धारित किए हैं, लेकिन ज्यादातर हाई, हायर सेकंडरी स्कूलों के खेल मैदान से खेल गायब हो गए हैं। खेल कैलेंडर दीवारों की शोभा मात्र बन कर रह गए हैं। ज्यादातर स्कूलों में छात्रों के खेल पीरियड का समय जहां क्लास में ही गुजर रहा है। वहीं खेल के नाम पर एक पीरियड छात्रों को लिए खाली छोड़कर औपचारिकता निभाई जा रही है। क्योंकि छात्रों को खेल खिलाकर खिलाड़ी बनाने स्कूलों में पर्याप्त खेल शिक्षक ही नहीं हैं। जबकि शैक्षणिक खेल कैलेंडर में टेबल टेनिस, बैड मिंटन, खो-खो, शतरंज, बालीबॉल, कबड्डी, बास्केटबॉल, हॉकी जैसे 50 से ज्यादा खेल शामिल किए गए हैं।

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178 स्कूल, खेल शिक्षकों की 40 पोस्ट, सिर्फ 20 की तैनाती

- स्कूली बच्चों को मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ्य रखने के अलावा खेल प्रतिभावाओं को उभार कर खिलाड़ी छात्र तैयार करने के लिए खेल पीरियड अनिवार्य किया गया है। लेकिन जिले की 178 हाई और हायर सेकंडरी स्कूलों में 80 प्रतिशत से ज्यादा स्कूलों में खेल शिक्षकों (पीटीआई) की तैनाती ही नहीं गई।

- 178 स्कूलों के लिए खेल शिक्षकों की 40 पोस्ट निर्धारित की गई है। सिर्फ 20 स्कूलों में ही खेल शिक्षक पदस्थ किए गए हैं। खेल शिक्षकों की कमी के चलते स्कूलों में न खेल पीरियड लग रहे न खिलाड़ी छात्र प्रशिक्षित हो किए जा रहे।

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6 पीरियड पढ़ाई, 2 खेल के निर्धारित

- शैक्षणिक कैलेंडर में 8 पीरियड निर्धारित किए गए हैं। इसमें 6 पढ़ाई और 2 पीरियड खेल के हैं।

- 40-40 मिनट के खेल पीरियड आखिरी में रखे गए हैं, ताकि पढ़ाई के बाद छात्र सिर्फ खेल खेलें।

- स्कूल शिक्षा विभाग ने स्कूल प्राचार्यों को अनिवार्य रूप से खेल पीरियड लगाने के निर्देश भी दिए हैं।

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स्कूल में ऐसे निभा रहे औपचारिकता

- ज्यादातर स्कूलों में खेल पीरियड के 40 मिनट छात्रों को अपने हाल में छोड़ दिया जाता है। चाहे खेलो, चाहे पढ़ते रहो।

- कुछ स्कूल ऐसे भी हैं जो पढ़ाई के पीरियड के दौरान बीच में ही खेल का एक पीरियड लगा रहे हैं। इसमें भी खेल शिक्षक न होने पर छात्र अपनी मर्जी से खो-खो, पिट्ठुक, बालीबॉल जैसे खेल खेलते हैं।

- ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ स्कूलों में तो आखिरी के खेल पीरियड में छात्रों की छुट्टी ही कर दी जाती है।

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खेल के नाम पर 60 से 100 रुपए भी ले रहे

- खेल के नाम पर 9वीं, 10 के छात्रों से 60 रुपए और 11वीं, 12वीं के छात्रों से सालाना 100 रुपए फीस भी ली जा रही। इसमें 40 प्रतिशत डीईओ (जिला शिक्षा अधिकारी) 15 प्रतिशत जेडी (संभागीय संयुक्त संचालक लोकशिक्षण) और 45 प्रतिशत स्कूल के खाते में जमा हो रहे।

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स्कूलों में पीटीआई शिक्षकों की कमी के कारण छात्र ट्रेंड नहीं हो पा रहे। ज्यादातर स्कूलों में खेल पीरियड तो लग रहे, लेकिन इससे छात्रों को लाभ नहीं मिल रहा।

-विनोद ठाकुर, जिला खेल अधिकारी, डीईओ

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क्या कहते हैं प्राचार्य

स्कूलों में खेल के दो पीरियड निर्धारित किए गए हैं। खेल पीरियड तो लगाते हैं, लेकिन प्रशिक्षित शिक्षक न होने से छात्र अपने स्तर पर ही खेल खेलते रहते हैं।

-पीके श्रीवास्तव, प्राचार्य, चेरीताल स्कूल

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पढ़ाई के बीच में ही एक खेल पीरियड निर्धारित किया गया है। इसी दौरान छात्र अपनी पंसद के खेल खेलते हैं।

-संजय परिहार, अधारताल स्कूल

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बारिश के कारण अभी खेल पीरियड नहीं लगा रहे। एडमिशन की प्रक्रिया भी चली रही है। अब फिर से खेल पीरियड शुरू करेंगे।

-गोपी चौबे, प्राचार्य, मेडिकल स्कूल

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