बागली (देवास)। प्रकृति की सुरम्य वादियों के बीच बागली से मात्र 3 कि मी दूर जटायु की तपोभूमि जटाशंकर तीर्थ स्थित है। यहां पर प्राकृतिक रूप से पत्थर के बने गोमुख से शिवलिंग पर बारह मास अखंड जलधारा प्रवाहित होकर अनादिकाल से जलाभिषेक होता आ रहा है।

साथ ही बिल्व पत्र का पेड़ ठीक शिवलिंग के ऊपर होने से स्वमेव बिल्व पत्र अर्पित हो जाते हैं। यहां का शिवलिंग नील लोहित है यानी लाल और नीले रंग से चंदन, तिलक और ओम की आकृति उस पर प्राकृतिक रूप से बनी है।

प्राचीन समय में जटायु ने यहां तपस्या की थी, इसलिए इसे जटाशंकर नाम से जाना जाता है। प्राचीन समय में घना जंगल मंदिर के आसपास हुआ करता था और शेर सहित अन्य जंगली जानवर यहां दिखाई देते थे। मुकुंदमुनि पं. रामाधार द्विवेदी ने बताया कि दिवंगत महंत फलाहारी बाबा शेर की सवारी भी करते थे।

तीर्थ पर मुरादें पूरी होने पर तुलादान भी कि या जाता है। महामृत्युंजय, काल सर्पयोग, त्रिपंडि शास्त्र आदि के विशिष्ट अनुष्ठान भी होते हैं। वर्ष 2007 से यहां अखंड रामायण पाठ भी चल रहा है। श्रावण मास में यहां मंदिर के समीप ही प्राकृतिक बरसाती झरने की कलकल आवाज दूर तक गूंजती रहती है।

साथ ही श्रावण में प्रतिदिन पंचामृत से सनी मिट्टी के 1008 शिवलिंगों का निर्माण कर यजमानों और पार्थिव पूजन होता है। यह खारी नदी का उदगम स्थल भी है। गोमुख से प्रवाहित होता पवित्र जल यहां से बहकर सीधा खारी कनेरी संगम जयंती माता होते हुए प्रेमगढ़ में नर्मदा नदी में मिल रहा है।

भोलेनाथ मंदिर के साथ-साथ यहां भगवान श्रीराम, लक्ष्मणजी, जानकी की मनोहारी आर्कषक प्रतिमा और प्रतिदिन बदलती पोशाख श्रद्धालुओं का मन मोह रही है। मंदिर के समीप ही बने कुंड में स्नान कि या जा सकता है। भूतड़ी अमावस्या पर बाहरी बाधाओं के कष्ट का निवारण करने वाले तांत्रिकों का यहां पर जमघट लग जाता है।

ब्रह्मलीन संत के शवदासजी महाराज के सान्निाध्य में यहां पर विशाल सामुदायिक भवन, धर्मशाला, यज्ञशाला, गोशाला, भोजन शाला के साथ-साथ नदी कि नारे बगीचे का निर्माण हुआ है। यहां पर ठहरने और भोजन बनाने की उत्तम व्यवस्था भी है। तीर्थ का विकास होते-होते अब मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य जोरशोर से चल रहा है।

प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर लगने वाला मेला और भंडारे का आयोजन यहां की विशिष्ट पहचान बन चुका है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपरी भाग में ब्रह्मलीन संत फलाहारी बाबा की संगमरमर की बनी समाधि और चरण पादुका पर श्रद्धालु आस्था के साथ अपना शीश नमाते हैं।

यहां पर परिवार और इष्टमित्रों के साथ पिकनिक मनाने और श्रावण की रिमझिम फु हारों के बीच झूले झूलने का मजा कु छ और ही है। जटाशंकर तीर्थ इंदौर और देवास से मात्र 60 कि मी की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए पक्की सड़क बनी हुई है। अब डेरी-बोरी घाट एवं सड़क बन जाने से यहां कांटाफोड़, सतवास, कन्‍नौद, खातेगांव एवं हरदा से भी सीधा जुड़ गया है।