मन की चंचलता से हावी होती हैं अशुभ प्रवृत्तियां

-प्रवर्तक जिनेंद्रमुनिजी के उद्गार, दीक्षा प्रसंग में तीन दिन शेष

थांदला। नईदुनिया न्यूज

कोई जीव पूर्व भव में शुभ कर्म करके और इस भव में ऐसे शुभ बंध का अनुबंध करके आया हो तो ही इस भव में उसे दीक्षा के भाव आते हैं। यही नहीं, इस भव में भी जिनेश्वर भगवान की वाणी और संत मुनिराज के सान्निाध्य में रहने से भी भावना प्रबल बनती है। नगर में एक ऐसा ही प्रसंग आया है। 18 वर्षीय मुमुक्षु भाई प्रशस्त रूनवाल दीक्षा मार्ग पर अग्रसर हो रहे है। इसे लेकर नगर और संपूर्ण समाज में उत्साह है।

ये विचार रविवार को पौषध भवन में आयोजित महती धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तक जिनेंद्रमुनिजी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को शुभ विचारों में ही रहना चाहिए, लेकिन मन की चंचलता के कारण व्यक्ति अशुभ प्रवृत्तियों की ओर आकर्षित होता रहता है। इस कारण शुभ विचारों से उसकी दूरी बढ़ती जाती है। शुभ विचारों से दूरी के चलते उसमें शुभ प्रवृत्तियां भी नहीं रहती है। शुभेषमुनिजी ने कहा कि गुरु की आज्ञा सर्वश्रेष्ठ होती है। गुरु का वात्सल्य बहुत महत्वपूर्ण होता है। गुरु आज्ञा का महत्व है। गुरु का अविनय करने पर मोक्ष प्राप्त नहीं होता। गुरु के महत्व को समझना चाहिए। अपनी आत्मा का दमन करना मुश्किल है। आत्मा का दमन संयम और तप से किया जा सकता है। बड़े-बड़े योद्घा हो जाते है पर वे भी अपनी आत्मा का दमन नहीं कर पाते। साध्वी संयमप्रभाजी ने कहा कि आचार्य उमेशमुनिजी की नगरी में दीक्षा का प्रसंग होने जा रहा है। इस नगर से अनेक दीक्षाएं हुई हैं। प्रशस्त भाई भी संयम मार्ग की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। वे 19 जनवरी को दीक्षा लेने जा रहे हैं। उनके बाल्यकाल का संस्मरण बताते हुए संयमप्रभाजी ने कहा कि इस बालक को प्रशस्त नाम आचार्य श्री उमेशमुनिजी द्वारा प्रदान किया गया था। अब यह संयोग सार्थक रूप ले रहा है। मुमुक्षु भाई ने बाल्यकाल से ही धर्मआराधना से जुड़े है। साथ ही अन्य लोगों को भी धर्म से जोड़ने का कार्य किया।

दीक्षा निमित्त स्वयं भी चले पुण्य मार्ग पर

साध्वी संयमप्रभाजी ने धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि ऐसे दीक्षा प्रसंग बिरले ही आते हैं। दीक्षा लेने वाली आत्मा तो स्वयं को सार्थक करने के लिए अग्रसर हो ही रही है। इन ऐतिहासिक क्षणों को पुण्य अर्जन के साथ भी जोड़ा जा सकता है। इसलिए जरूरी है, कि श्रावक- श्राविकाएं भी यथा शक्ति संकल्प लेकर अपने जीवन को पुण्यमार्ग पर अग्रसर करें। धर्मसभा में जिनेंद्रमुनिजी के मुखारविंद से नेहा प्रांजल लोढ़ा ने 7 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। इसके अलावा बड़ी संख्या में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने उपवास, आयंबिल, नींवी आदि विविध तप के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। धर्मसभा में महावीर जैन पाठशाला के विद्यार्थियों ने दीक्षा प्रसंग को लेकर आकर्षक प्रस्तुति दी। प्रभावना का लाभ चौधरी परिवार ने लिया। संचालन श्रीसंघ के सचिव प्रदीप गादिया ने किया। धर्मसभा में श्रीसंघ की ओर से ललित जैन नवयुवक मंडल के पूर्व कोषाध्यक्ष मुकेश चौधरी की 1.5 वर्ष की रत्नावली तप की तपस्या पूर्ण होने पर नेहा प्रांजल लोढ़ा ने 9 उपवास की बोली लेकर बहुमान किया। धर्मसभा में दाहोद, लिमड़ी, रतलाम, धार आदि स्थानों के श्रावक श्राविकाएं उपस्थित थे।

प्रतिदिन हो रही है चौविसियां

दीक्षा के अनुमोदनार्थ विभिन्न संस्थाओं और परिवारों द्वारा प्रतिदिन चौविसियों का आयोजन पौषध भवन में किया जा रहा है। इनमें सैकड़ों महिलाएं एक जैसे ड्रेस कोड के साथ भाग लेकर भाव-विभोर करने वाली चौविसियों का सामूहिक गायन कर रही है।