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    आचार्यद्वय ने चंदाबाई पगारिया को तपस्वी रत्ना से किया अलंकृत

    Published: Sun, 14 Jan 2018 07:32 PM (IST) | Updated: Sun, 14 Jan 2018 07:32 PM (IST)
    By: Editorial Team

    आचार्यद्वय ने चंदाबाई पगारिया को

    तपस्वी रत्ना से किया अलंकृत

    पारा। नईदुनिया न्यूज

    पुण्य सम्राट लोकसंत श्रीमद विजय जयंतसेनसूरीश्वरजी के पट्टधर गच्छाधिपति नित्यसेनसूरीश्वरजी व आचार्य देवेश श्रीमद विजय जयरत्नसूरीश्वरजी ने पारा में आयोजित स्व. पनीबाई सकलेचा के जिनेंद्र भक्ति महोत्सव में तपस्वी सुश्राविका चंदाबाई मोतीलाल पगारिया को संपूर्ण श्रीसंघ के समक्ष तपस्वी रत्ना की उपाधि से अलंकृत किया।

    सादगीपूर्वक जीवन जीने वाली सरल स्वभावी 75 वर्षीय चंदाबाई नगर में चंदा जीजी के नाम से जानी जाती है। 18 वर्ष की उम्र में हुए विवाह के बाद से ही चंदा जीजी ने जो कठोरतम तपस्याएं शुरू की, जो आज 57 वर्ष की उम्र के बाद भी अनवरत जारी है।

    ये कठिन धर्म आराधनाएं कीं

    चौमासा- एक मोहनखेड़ा और दूसरा पालीताणा तीर्थ।

    छःरि पालक पैदल संघ- दो सिद्धाचलजी, गिरनारजी, लक्ष्मणीजी, नागेश्वरजी।

    उपधान तप- तीन बार 30, 40 व 50 दिनों की तपस्या, जिसमें बिना स्नान किए साधु जीवन में रहकर प्रतिदिन तपस्या करनी होती है।

    सिद्धाचलजी की चौविहार छठ यात्रा- सात बार - जैन सिद्धांतो में यह तपस्या कठिनतम मानी जाती है। इसमें दो दिनों तक उपवास करते (जल का भी) त्याग पालीताणा पहाड़ की 7 यात्रा होती है।

    वर्षीतप- दो - वर्ष भर चलने वाली इस तपस्या में पूरे वर्ष में 160 दिनों से अधिक उपवास करने होते हैं। बाकी दिनों में भी तपस्याएं करनी होती है।

    विस स्थानक तप की ओली- इस तपस्या में एक वर्ष में 40 या उससे भी अधिक उपवास या एकासने किए जाते हैं।

    वर्धमान तप की ओली- इस तपस्या में बीना मिर्च, घी , तेल का खाना जिसे आयंबिल कहा जाता है किया जाता है।

    नवपदजी की ओली- वर्ष में दो बार लगातार 9 दिनों तक बीना नमक, घी, तेल का खाना आयंबिल किया जाता है।

    अट्ठाई- दो - लगातार आठ उपवास।

    नवकार आराधना- 21 - वर्ष में एक बाद लगातार नौ दिनों तक एकासने होते हैं।

    शंखेश्वर पार्श्व प्रभु के तेले- 18- वर्ष में एक लगातार 3 दिनों तक उपवास।

    पर्युषण महापर्व पर अट्ठम तप- इस तपस्या में आठ दिनों में 5 उपवास किए जाते हैं।

    पंच महावृत तप, पंचमी, दशमी, ग्यारस, मेरू तेरस

    सिद्धितप- 44 दिनों की इस तपस्या में 36 उपवास किए जाते हैं।

    इन सब तपस्याओं के अतिरिक्त वे प्रतिदिन कम से कम बियासना करती हैं। साथ ही आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का नियम भी ले रखा है। तपस्वी रत्ना की उपाधि से अलंकृत करने पर पारा श्रीसंघ ने आचार्यद्वय के प्रति आभार माना है।

    और जानें :  # jhabua news
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