खंडवा, नईदुनिया प्रतिनिधि। ओंकारेश्वर बांध प्रभावितों के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में सरकार को आदेश दिया है कि वह विस्थापितों की इच्छानुसार उन्हें खेती योग्य जमीन दे या मुआवजे व पैकेज पर 15 प्रतिशत की दर से ब्याज चुकाए। यह काम सरकार को तीन महीने में करना होगा। विस्थापितों ने कहा है कि इसके साथ ही वे 28 मार्च को भोपाल में सरकार को पुनर्वास-विस्थापन की अन्य मांगों से भी अवगत करवाने जा रहे हैं।

मंगलवार को यहां नर्मदा आंदोलन के वरिष्ठ कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल ने फैसले के संदर्भ में मंगलवार को मीडिया से चर्चा करते हुए बताया कि विस्थापित यदि मुआवजा और विशेष पैकेज का विकल्प चुनता है तो सरकार को मुआवजे और पैकेज पर अतिरिक्त 15 प्रतिशत ब्याज देना होगा। उन्होंने बताया कि ओंकारेश्वर बांध विस्थापित 12 साल से अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। 2008 में मप्र उच्च न्यायालय ने विस्थापितों को जमीन देने का आदेश दिया लेकिन सरकार ने फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर दी। 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने पुन: जमीन देने का आदेश दिया और इस मामले में शिकायत निवारण प्राधिकरण में जाने को कहा।

2300 विस्थापितों की याचिका पर शिकायत निवारण प्राधिकरण ने अपने आदेशों में कहा कि सरकार ने पुनर्वास नीति का पालन नहीं किया है और यदि विस्थापित उसे दिए मुआवजे का आधा और विशेष पुनर्वास अनुदान वापस करता है तो उसे जमीन दी जाएगी। इसके बाद 700 विस्थापितों द्वारा पैसा वापस करने के बावजूद सरकार ने मात्र 200 विस्थापितों को जमीन दिखाई जो कि बंजर और अतिक्रमित थी। इस पर उन्होंने जमीन लेने से इंकार कर दिया। इन 700 में से 300 से अधिक विस्थापित हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जद में आते हैं।

अवमानना याचिका पर फैसले

2012 में सरकार ने ओंकारेश्वर बांध में दो मीटर पानी बढ़ा दिया। इसके खिलाफ नर्मदा आंदोलन की वरिष्ठ कार्यकर्ता चित्तरूपा पालित और विस्थापितों ने ग्राम घोघलगांव में 17 दिन जल सत्याग्रह किया था, बाद सरकार को पानी कम करना पड़ा। तीन मंत्रियों की समिति बनाई और उसकी अनुशंसा पर 7 जून 2013 को 225 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज दिया गया। इसके बाद 2015 में पुन: आंदोलन के वरिष्ठ कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल और विस्थापितों ने 32 दिन जल सत्याग्रह किया। यह पैकेज छोटे व हरिजन/आदिवासी किसानों के लिए पुनर्वास नीति व सर्वोच्च न्यायलय के आदेश के अनुरूप नहीं था। सरकार खराब जमीन दिखाकर विस्थापितों को मजबूर कर रही थी, इस वजह से नर्मदा आंदोलन ने सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर की। इस याचिका पर 13 मार्च के अपने फैसले में न्यायालय ने उक्त आदेश दिया है।

फैसले में यह कहा

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायाधीश दीपक गुप्ता और संजीव खन्ना की पीठ ने अपने आदेश में कहा है कि संबंधित विभाग तत्काल याचिकाकर्ता/व्यक्तियों द्वारा मांगे जाने पर खेती योग्य जमीन उपलब्ध कराए, यह प्रश्न (खेती योग्यता का) विवादित होने पर संबंधित शिकायत निवारण प्राधिकरण द्वारा निर्धारित किया जाएगा। यदि कोई व्यक्ति यह विकल्प नहीं लेता है तो वह उसके द्वारा जमा किए गए मुआवजे की आधी राशी और विशेष पुनर्वास अनुदान (एसआरजी) की पूरी राशि वापस लेने के लिए स्वतंत्र होगा, जो कि उसे जमा की गई तारीख से भुगतान की तारीख तक 15 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज के साथ दी जाएगी।

इसके अलावा वह व्यक्ति मध्य प्रदेश सरकार के आदेश सात जून 2013 के अनुसार भी भुगतान के लिए पात्र होगा, यानि अधिकृत जमीन एक एकड़ से कम होने पर दो लाख रुपए प्रति एकड़ और अधिकृत जमीन एक एकड़ से अधिक होने पर दो लाख रुपए प्रति एकड़ अधिकतम 20 लाख रुपए तक दिए जाएंगे। इस राशि पर भी आदेश सात जून 2013 से भुगतान की तारीख तक 15 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज दिया जाएगा। यह करवाई तेजी से और विकल्प मांगने के तीन महीने के अंदर पूरी की जाए। इन आदेशों के बाद अवमानना याचिका समाप्त कर दी गई है।