खरगोन। आखिरकार मोदी लहर ने इस लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी गजेंद्र पटेल ने यह गढ़ जीत लिया। भाजपा जश्न में डूब गई। गुरुवार शाम जैसे ही जिला निर्वाचन अधिकारी ने गजेंद्र के विजयी होने की अधिकृत होने की घोषणा की वैसे ही समर्थक सड़कों पर आ गए। शुरुआत से गजेंद्र ने बढ़त बनाई, फिर उन्होंने पलटकर नहीं देखा। देखते ही देखते मतों का फासला हजारों से लाखों में बदला और वे जीत गए। अंतिम परिणामों के अनुसार गजेंद्र ने कांग्रेस के डॉ. गोविंद मुजाल्दा को दो लाख दो हजार 110 वोट से पराजित किया।

पिछले 10 वर्षों से यह सीट आदिवासी के लिए आरक्षित है। इस लोकसभा अंतर्गत खरगोन व बड़वानी जिले की आठ विधानसभाएं शामिल हैं। बड़वानी जिले की बड़वानी, राजपुर, पानसेमल व सेंधवा, जबकि खरगोन जिले की खरगोन, भगवानपुरा, महेश्वर व कसरावद विधानसभा सीट। 2009 में यहां मकनसिंह सोलंकी भाजपा से जीते। इसके बाद 2014 में सुभाष पटेल ने भाजपा सीट को बरकरार रखा। यह लोकसभा 1952 से अस्तित्व में है। खरगोन से कांग्रेस के वैजनाथ महोदय पहले सांसद चुने गए थे।

ऐसा रहा है खरगोन सीट का इतिहास

इस लोकसभा सीट पर कई किस्से और मुद्दे चर्चित रहे हैं। 2005 में भाजपा के दिग्गज व पूर्व प्रदेश संगठन मंत्री कृष्णमुरारी मोघे ने इंदौर से आकर यहां चुनाव लड़ा। बाहरी उम्मीदवार बताने के बावजूद उन्होंने यहां जीत हासिल की। 2007 में लाभ के पद के मामले में मोघे को सीट छोड़ना पड़ी। 2007 में उपचुनाव में पूर्व उप मुख्यमंत्री सुभाष यादव के बड़े बेटे अरुण यादव ने कांग्रेस से राजनीतिक जिंदगी की शुरुआत की। यादव ने मोघे को एक लाख से अधिक मतों से पराजित किया। कांग्रेस ने यादव जैसे नए आकर्षक चेहरे के बल पर भाजपा से यह सीट छीन ली। परंतु यादव की किस्मत भी इस जिले में इससे आगे नहीं बढ़ी। 2009 में यह सीट परिसीमन में आकर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो गई। 2009 में यहां भाजपा के मकनसिंह सोलंकी चुनाव जीते। 2014 में सोलंकी का टिकट काटकर राजपुर के सुभाष पटेल को आजमाया। पटेल रिकॉर्ड सवा दो लाख मतों से जीते।

मतदाताओं के साथ हो चुका है धोखा

यहां के मतदाता किस तरह ठगे गए उसका उदाहरण भी देखने को मिला। 1967 में दिल्ली से आकर शशिभूषण वाजपेयी भी कांग्रेस से चुनाव लड़े। क्षेत्रवासियों का आरोप रहा कि वाजपेयी ने कुछ खेतों में रेल की पटरियां डलवा दी। घोषणा की गई कि चुनाव जीतते ही खंडवा-खरगोन के बीच रेलवे लाइन बिछाई जाएगी, वाजपेयी चुनाव जीते। जीतने के बाद कभी लौटकर नहीं आए।