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    खाद्य पदार्थों व दवाओं की जांच के लिए इंदौर, जबलपुर व ग्वालियर में बनेगी लैब

    Published: Thu, 15 Mar 2018 04:12 AM (IST) | Updated: Thu, 15 Mar 2018 04:12 AM (IST)
    By: Editorial Team

    - तीन रीजनल लैब बनने से जल्द हो पाएगी सैंपलों की जांच

    - इंदौर में जगह चिन्हित, ग्वालियर-जबलपुर में तलाश जारी

    भोपाल। नवदुनिया प्रतिनिधि

    खान-पान की चीजों व दवाओं की जांच के लिए प्रदेश में तीन नई रीजनल लैब बनाई जा रही हैं। ये लैब इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में बनेंगी। इंदौर के लिए जगह चिन्हित कर ली गई है। ग्वालियर और जबलपुर में जगह चिन्हित करने का काम चल रहा है। जगह मिलने के दो से तीन साल में यह लैब बन तैयार हो जाएंगी।

    अभी प्रदेश में खानपान की चीजों की जांच के लिए सिर्फ भोपाल के ईदगाह हिल्स में एक लैब है। यहां दवाओं की जांच के लिए भी एक ही लैब है। जिसके चलते प्रदेश भर से आने वाले नमूनों की संख्या बढ़ने से यहां जांच के लिए लंबी वेटिंग रहती है। लिहाजा सैंपल लेने में समय और पैसा तो बेकार होता है, लेकिन नमूनों की समय पर जांच नहीं हो पाती। इससे क्वालिटी सुधारने में इसका फायदा नहीं मिल पाता। फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के अफसरों ने बताया कि तीनों नई लैब में खान-पान की चीजों के साथ दवाओं की भी जांच होगी। लैब नेशनल एक्रीडिटेशन बोर्ड फॉर लैबोरेट्रीज (एलएबीएल) से मान्यता प्राप्त होंगी।

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    तीनों शहरों में लैब बनने से यह होगा फायदा

    - नई लैब बनने के बाद इन महानगरों व आसपास के जिलों के सैंपल यहां भेजे जाएंगे, जिससे सैंपल भेजने में होने वाला खर्च और समय बचेगा।

    - आमजन भी खुद सैंपल की जांच इन लैब में करा सकेंगे। अभी सिर्फ भोपाल में लैब होने से दूसरे जिलों के लोग खान-पान की चीजों की जांच नहीं करा पाते।

    - एनएबीएल लैब होने से जांच की क्वालिटी बेहतर होगी। इसे हर जगह मान्य किया जा सकेगा।

    - रिपोर्ट भेजने में भी देरी नहीं होगी।

    - नमूनों की जांच पेंडिंग नहीं रहेगी।

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    - अभी यह दिक्कत

    प्रदेश में फूड सेफ्टी ऑफिसर्स की संख्या 160 है। हर इंस्पेक्टर को चार लीगल सैंपल (जिनके फेल होने पर कोर्ट में प्रकरण दर्ज किया जाता है) व आठ सर्विलांस (निगरानी) के लिए लेने होते हैं। हर साल करीब 4 हजार नमूनें जांच के लिए आते हैं, लेकिन सर्विलांस सैंपलों की जांच में कई बार तीन से चार महीने लग जाते हैं। हर समय 1 हजार से ज्यादा नमूनों की जांच पेंडिंग रहती है। इसकी वजह यह कि लैब की क्षमता कम है। इसी तरह से ड्रग लैब में जांच के लिए हर साल 1500 से 2000 नमूने आते हैं, लेकिन जांच करीब 1200 नमूनों की ही हो पाती है। दवाओं की जांच में कई दवाएं अमानक आती हैं, पर जांच होने तक 60 फीसदी से ज्यादा दवाएं बंट चुकी होती हैं। ऐसे कई मामले भी आए हैं, जब एक्सपायरी के एक-दो महीने पहले रिपोर्ट आई है।

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    - जल्द हो पाएगी जांच

    इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में लैब बनाई जा रही हैं। लैब बनने के बाद नमूनों की जांच जल्दी हो सकेगी। माइक्रोबायोलाजिकल व हेवी मेटल की जांच के लिए भी भोपाल में लैब बन रही है।

    बृजेश सक्सेना, संयुक्त संचालक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन

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