मुरैना से शिवप्रताप सिंह जादौन। अरब यात्री इब्नबतूता सन् 1342 में कन्नौज से भिंड होता हुआ मुरैना के अलापुर आया था। उस समय मुरैना का कोई अस्तित्व नहीं था और अलापुर ही ग्वालियर राज्य का एक सुदृढ़ दुर्ग हुआ करता था। इब्नबतूता के यात्रा वृतांत के अलावा आईने-अकबरी में भी अलापुर को ग्वालियर का एक मजबूत ठिकाना बताया गया था। इब्नबतूता ने अपने यात्रा वृतांत में लिखा है कि जब वह यहां आया था तब यहां के हाकिम (प्रशासक) बद्र के बेटे को दिल्ली से ऐसाह आ बसे महाराज अनंगपाल तोमर के वंशज घाटम देव तोमर ने किस तरह से मौत के घाट उतार दिया था। ग्वालियर स्टेट में साल 1904 तक जौरा सिकरवारी सूबा का मुख्यालय रहा। यहीं पर अलापुर नाम का अत्यंत प्राचीन गांव आज भी है।

ग्वालियर स्टेट गजेटियर सन् 1911 के अनुसार इस गांव में बहुत से पुराने दिलचस्प अवशेष व निशान मिलते हैं। मुमकिन है कि यह वही अलापुर हो जिसका जिक्र इब्नबतूता ने किया है कि आगरा से ग्वालियर के रास्ते पर वह यहां ठहरा था। मध्य प्रदेश शासन में डिप्टी कलेक्टर के तौर पर यहां पदस्थ रहे इतिहासविद् रूपेश उपाध्याय कहते हैं कि इब्नबतूता सन् 1342 में अलापुर आया था। उस समय दिल्ली की तुर्क सल्तनत की ओर से बद्र नामक हब्सी दास यहां प्रशासक था। नेशनल बुक ट्रस्ट की पुस्तक 'चौदहवीं सदी का भारत और इब्नबतूता की भारत यात्रा' में इब्नबतूता के हवाले से कहा गया है कि अलापुर का हाकिम बद्र शरीर से इतना लंबा- चौड़ा और मजबूत था कि वह एक बार में पूरा बकरा खा जाता था।

भोजन के बाद तीन पाव घी पी जाता था। इब्नबतूता ने लिखा है कि बद्र आसपास के इलाकों पर आक्रमण कर देता था और वहां विद्रोहियों को या तो मार डालता या फिर बंदी बना लेता था, लोग उससे खौफ खाने लगे थे। रुपेश उपाध्याय बताते हैं कि चंबल के तोमरों का इलाका अलापुर से एक दिन की यात्रा की दूरी पर था, जो ऐसाह के नाम से जाना जाता है। तोमरों के इलाके के एक गांव पर भी बद्र ने आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में बद्र घोड़े सहित एक गड्ढे में जा गिरा वहीं एक ग्रामवासी ने कटार से उसकी हत्या कर दी।

इब्नबतूता ने लिखा है कि बद्र के सैनिक घोड़े को लेकर अलापुर पहुंचे और उसे बद्र के पुत्र को दे दिया। बद्र के बेटे ने उनसे अकेले झगड़ना ठीक नही समझा और अपने पिता के घोड़े पर बैठकर दिल्ली के सुल्तान के पास फरियाद के लिए चल दिया। ऐसाह के तोमर शासक कमलसिंह उर्फ घाटम देव सतर्क हुए और उन्होंने बद्र के पुत्र को मार डाला। इसके बाद आलमपुर का प्रशासन बद्र के दामाद ने संभाला। इब्नबतूता ने अपनी किताब में अलापुर के लोगों की तारीफ करते हुए कहा कि यहां का अनाज और लोग उत्तम हैं। इब्नबतूता के मुताबिक यहां का गेहूं दिल्ली भेजा जाता है। यहां के हिंदू बड़े रूपवान हैं। जिस गढ़ी में इब्नबतूता ठहरा था। वहां अब आबादी हो गई है। सिर्फ एक दरवाजा ही सलामत है।

1781 में हुआ था युद्ध

14वीं सदी के बाद 17वीं सदी में मुगल बादशाह मुहम्मद शाह की ओर से ग्वालियर में सरदार पीर खान को अपना फौजदार नियुक्त किया गया था। पीर खान नरवर के प्रधानमंत्री और सेनापति खंडेराव से विद्वेष रखने लगा था और नरवर पर कब्जा करना चाहता था। खांडेराव के पुत्र सूरत राय ने उसे अलापुर के मैदान में सन् 1781 में परास्त किया था। सूरत राय की इस जोरदार विजय के उपलक्ष्य में अलापुर का नाम जौरा रखा गया। खंडेराव दो माह तक अलापुर रहे। यहां उन्होंने एक गढ़ी का निर्माण करवाया और उसके सामने एक बड़ा कुआं खुदवा कर बीजक लगवाया, जो आज भी है।