मुरैना। राज्य मानवाधिकार आयोग ने मार्च 2015 में गृह विभाग के प्रमुख सचिव और पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर निर्देश दिए थे कि हवालात में ऐसी कोई असावधानी नहीं बरती जाए, जिससे यहां बंद कोई आरोपित आत्महत्या कर ले या करने का प्रयास करे।

इन निर्देशों का पालन करने के लिए मई 2015 तक का समय आयोग ने पुलिस को दिया था। चार सालों बाद भी प्रदेश के थानों की हवालतों में ऐसा नहीं हो पाया है। आयोग के सदस्यों का कहना है कि इस तरह के कुछ मामले हाल ही में सामने आए हैं।

तकरीबन चार साल पहले ग्वालियर के झांसी रोड थाने में पुलिस अभिरक्षा में एक आरोपित की मौत हो गई थी। इस मामले में ग्वालियर के आरटीआई एक्टिविस्ट गौरव पांडे ने आयोग में शिकायत की थी। जिसके बाद आयोग ने हवालात में जरूरी सुधार संबंधी निर्देश 13 मार्च 2015 को पत्र के माध्यम से गृह विभाग के लिए जारी किए थे। आयोग की अनुशंसा का पालन नहीं होने का ही परिणाम है कि सोमवार को दिमनी थाने की हवालात में बंद आरोपित ने फांसी लगाकर जान दे दी थी।

आयोग ने यह भी करवाया था

आयोग के सदस्य मनोहर ममतानी कहते हैं कि आयोग ने इस तरह की घटनाएं रोकने के लिए डीजीपी कार्यालय से निर्देश जारी करवाए थे। इसके अलावा अभिरक्षा प्रबंधन की एक पुस्तिका भी अलग से प्रिंट कराकर थाना स्तर तक दी गई थी। हवालातों में सीसीटीवी कैमरे लगवाए थे, ताकि पुलिस मॉनीटर पर ही बंदियों को देख सके।

यह हैं आयोग की अनुशंसा

  • आयोग ने शासन से कहा कहा था कि आईजी, एसपी, डीएसपी आदि को जिम्मेदार बनाया जाए ताकि वे 15 अप्रैल 2015 से पहले हवालातों को निर्देशों के अनुरूप ठीक करवाएं।
  • 2 मार्च 2015 के बाद प्रदेश में कहीं भी अभिरक्षा में बंदी आत्महत्या न कर पाए और नहीं उपचार के अभाव में किसी मौत हो।
  • थाने में लाए जाने वाले व्यक्ति का मेडिकल तत्काल करवाया जाए।
  • हवालात में फांसी का फंदा बनाने लायक कोई चीज मौजूद न रहे।
  • थानों में खिड़की, दरवाजे, रोशनदान, रोड, एंगल, बिजली के तार जैसी कोई वस्तु नहीं हो, जिससे रस्सी आदि बांधकर कोई फांसी लगा सके।
  • हवालात के बाहर एक कर्मचारी तैनात हो जो लगातार बंदियों पर नजर रख सके।

चार-पांच प्रकरण सामने आए

अभिरक्षा प्रबंधन के बारे में पुलिस को समझाया गया था। हाल ही में इस तरह के 4-5 प्रकरण आयोग के सामने आए। इनमें पीड़ित परिवार को 5-5 लाख तक के मुआवजे दिलवाए गए और दोषी पुलिस कर्मियों के विरुद्ध विभागीय दंडात्मक कार्रवाई हुई। पुलिस का दायित्व है कि उसे हवालात में कोई भी गलत कदम उठाने से रोका जाए।

मनोहर ममतानी, सदस्य राज्य मानवाधिकार आयोग मध्यप्रदेश