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    चंबल की वादियों में दफ्न है सलीम-अनारकली जैसी प्रेम कहानी

    Published: Tue, 13 Feb 2018 06:39 PM (IST) | Updated: Thu, 15 Feb 2018 07:47 AM (IST)
    By: Editorial Team
    morena ganna begam 13 02 2018

    मुरैना (शिवप्रताप सिंह जादौन)। शहजादे सलीम और कनीज अनारकली की प्रेमकहानी को लोग बेशक फसाना कहें। लेकिन इसी प्रेमकहानी से मिलती जुलती एक हकीकत चंबल की वादियों में दफ्न है। ये दास्तान-ए-इश्क एक शहजादे और खूबसूरत कनीज की है, जिसकी खूबसूरती को देखकर उस जमाने के कितने ही नवाब और राजे महाराजे उसे पाने के लिए बेकरार थे। लेकिन बदकिस्मती से इस प्रेम कहानी में भी नायिका अपने शहजादे को पा न सकी। आखिर में उसकी दर्दनाक मौत हुई। इस अधूरी प्रेम कहानी के स्मारक के तौर पर नायिका का मकबरा मुरैना के नूराबाद कस्बे में मौजूद है।

    ये कहानी ईरान से शुरू होती है। ईरान की रहने वाली सुरैया के यहां 17वीं सदी में एक बच्ची ने जन्म लिया। चंद्रमा की कलाओं की तरह बढ़ती इस बच्ची की आवाज इतनी मीठी थी कि उसका नाम ही गन्ना रख दिया गया। गन्ना के पिता अली कुली और मां सुरैया ईरान से अवध में रहने चले आए। यहां अवध के नवाब सिराजोद्दौला ने गन्ना को देखा और उससे एक तरफा प्रेम करने लगा।

    लेकिन गन्ना की आंखें पहले ही भरतपुर के शासक सूरजमल के बेटे जवाहर सिंह से चार हो चुकी थीं। गन्ना के पिता से सिराजोद्दौला ने गन्ना का हाथ मांगा। लेकिन गन्ना भागकर जवाहर सिंह के यहां पहुंच गई। सूरज मल ने इसका विरोध किया जिसके चलते पिता सूरज मल और जवाहर सिंह के बीच युद्ध हुआ जो बेनतीजा रहा। आखिर में गन्ना को सिराजोद्दौला के हवाले कर दिया गया। लेकिन सिराजोद्दौला का विवाह दिल्ली के अक्रांता बादशाह अब्दुल शाह के दूर के रिश्ते की बहन उमदा बेगम से हो गया। उमदा ने शर्त रखी कि गन्ना सिराजोद्दौला की पत्नी नहीं बल्कि कनीज बनकर रहेगी। इतिहासविद डॉ. मधुबाला कुलश्रेष्ठ के मुताबिक गन्ना को यह बात नागवार गुजरी और वह भाग कर ग्वालियर आ गई। जहां महादजी सिंधिया शासन करते थे।

    महादजी थे गन्ना की वीरता के कायल

    अपने प्यार जवाहर सिंह को पाने में असमर्थ गन्ना महादजी सिंधिया के खुफिया विभाग में गुनी सिंह बनकर रहने लगी। एक दिन महादजी पर हुए कातिलाना हमले को असफल करते समय गन्ना की हकीकत महादजी के सामने जाहिर हो गई। इसके बाद वे गन्ना की वीरता के कायल हो गए और उन्होंने गन्ना की हकीकत जाहिर नहीं होने दी।

    आबरू बचाने गन्ना ने खा लिया जहर

    सिराजोद्दौला ग्वालियर में मोहम्मद गौस के मकबरे पर आए हुए थे। गन्ना यहां सिराजोद्दौला की जासूसी के लिए गई थी। लेकिन सिराजोद्दौला ने चाल ढाल से गन्ना को पहचान लिया। उसने सैनिकों को गन्ना को पकड़ने के लिए कहा। सिराजोद्दौला गन्ना को नूराबाद सांक नदी तक ले आया। लेकिन यहां गन्ना ने अपनी आबरू बचाने अंगूठी में मौजूद जहर को खा लिया। बांग्ला साहित्यकार ताराशंकर बंदोपाध्याय की पुस्तक में उल्लेख मिलता है कि गन्ना की इस बदनसीबी से दु:खी महादजी सिंधिया ने नूराबाद में 1770 में गन्ना बेगम का मकबरा बनवाया। जहां गन्ना की मातृ भाषा में लिखवाया गया- आह! गम-ए-गन्ना बेगम। यह पत्थर देखरेख के अभाव में गन्ना की कब्र के पास से चोरी हो चुका है।

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