मुरैना। नईदुनिया प्रतिनिधि

हाल ही में वन विभाग ने गलेथा गांव से 14 ट्रॉली और 2 डंपर भरकर रेत जब्त किया था। इस कार्रवाई के बाद विभाग ने अपनी पीठ भी थपथपाई थी। लेकिन अगले ही दिन से यह कार्रवाई बंद कर दी गई। इसके विपरीत चंबल किनारे के गांवों में रेत चोरी का काम करने वाले लोगों ने रेत का बंपर स्टॉक कर रखा है। इसकी सूचनाएं चंबल के घाट प्रभारी और चौकीदारों ने वन विभाग को दी हैं। लेकिन रिस्क से बचने के लिए वन विभाग ने इन इलाकों में कार्रवाई करना उचित ही नहीं समझा है।

सबलगढ़ से मुरैना तक और मुरैना से पोरसा तक चंबल किनारे के गांवों में सरकारी जमीनों और रास्तों के किनारे रेत का अथाह भंडार किया गया है। माफिया नदी से रेत लाकर दूसरी जगहों पर स्टॉक करता है और यहां से रेत का परिवहन मुरैना शहर, बानमोर, ग्वालियर सहित यूपी व राजस्थान के विभिन्ना जिलों में किया जाता है। वन विभाग ने हाल ही में यह दावा किया था कि उनके द्वारा इस तरह के रेत स्टॉक की रैकी की जा रही है। विभाग ने इसी रैकी का नतीजा गलेथा में की गई कार्रवाई को बताया था। लेकिन यहां से विभाग नाम मात्र का रेत ही जब्त कर पाया था। जबकि वन विभाग के सूत्रों की मुताबिक कई सैकड़ा घन मीटर रेत इस इलाके में यहां अभी भी डंप है।

हमले के डर से स्तरीय कार्रवाई

वन विभाग के सूत्रों की मानें तो फिलहाल अभियारण्य में खनन रोकने के लिए भेजी गई एसएएफ चुनाव कार्य के लिए हटा ली गई है। यही वजह कि वन विभाग डंपिंग वाली जगहों पर कार्रवाई करने के लिए जाने से बच रहा है। वन विभाग ने गलेथा में भी पुलिस बल के साथ कार्रवाई की थी। हमलों के डर से ही वन विभाग चंबल किनारे के गांवों में कार्रवाई करने की बजाय उन इलाकों में कार्रवाई कर रही है जहां तटस्थ रहकर काम करना संभव हो। यही वजह है कि गलेथा में वन अमला दोबारा कार्रवाई के लिए नहीं पहुंचा।

नाक के नीचे ही खनन और डंपिंग

वन विभाग ने अभयारण्य में कई जगहों पर लोकल हेचरी और साइट बना रखी हैं। यहां वन अधिकारियों का आना जाना होता रहता है। इन इलाकों में जाने वाले रास्तों के किनारे रेत की डंपिंग साफ नजर आती है। लेकिन नाक के नीचे की जा रही रेत की यह डंपिंग वन विभाग को दिखाई ही नहीं दे रही है। यही वजह है कि माफिया को भी डंपिंग के लिए पूरी स्वतंत्रता मिल गई है।

फोटो समेत - गांव में इस तरह डंप की जा रही है रेत