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जबलपुर। नईदुनिया रिपोर्टर

ठंड आते ही शहर में दूर देश के पंछियों का आगमन शुरू हो गया है। कोई हिमालय की तराई से आ रहा है तो यूरोप, चीन जैसे उत्तरीय ठंडे क्षेत्रों से आने वाले पक्षियों की भी कमी नहीं है। हां, ये बात अलग है कि शहर में मौजूद तालाबों के आसपास ज्यादा चहल-पहल होने से कुछ माइग्रेटरी बर्ड्स शहर के बाहर के तालाबों और खेतों में अपना डेरा बनाए हुए हैं। शहर हो या शहर के आसपास के स्थान। इन विदेशी पक्षियों की मेहमाननवाजी करने शहर तैयार है।

छह माह तक रहेगा वास

ग्वारीघाट में दिखने वाली माइग्रेटरी बर्ड्स पिछले 4 से 5 सालों से लगातार ग्वारीघाट पहुंच रहीं हैं। ब्राउन हैडेड और ब्लैक गल नामक ये पक्षी हिमालय की तराई वाले स्थानों के साथ ही लेह, लद्दाख से चलकर आते हैं। मध्य भारत और दक्षिण भारत के क्षेत्रों में जहां भी इन्हें अपने लिए अनुकूल माहौल मिलता है वहां ये ठहरते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि ये गल जलचर हैं। ग्वारीघाट में इन्हें पानी की पर्याप्त मात्रा के साथ ही भोजन भी मिलता है इसलिए ये हर साल यहां ठंड के दिनों से छह माह तक रहते हैं। गर्मी शुरू होते ही ये वापस अपने क्षेत्रों की और लौटते हैं।

पाटन रोड और भंवरताल

माइग्रेटरी बर्ड्स की कुछ प्रजातियां पाटन रोड, भंवरताल गार्डन के आसपास देखने मिल रही हैं। जिन्हें बर्ड वॉचर अपने कैमरे में कैद करने के लिए सुबह-सुबह पाटन रोड पहुंच रहे हैं। वर्बलर्स नामक चिड़िया गौरैया से भी छोटी होती है और इसकी 6 से 7 प्रजातियां यहां दिखती हैं। इसके साथ ही रेड स्टार्ट, वेडर्स व वेगटेल्स बर्ड्स भी शहर आ पहुंची हैं। इनके वेगटेल्स माइग्रेटरी बर्ड तो भंवरताल के गार्डन की घास उछलकूद करते हुए बड़ी आसानी से देखी जा रही है। ये सभी चीन और यूरोपियन देशों से अनुकूल माहौल खोजते हुए शहर पहुंची हैं।

उथले तालाबों में वाइल्ड फाउल

एक अन्य माइग्रेटरी बर्ड है वाइल्ड फाउल। जो उथले तालाबों में रहती है। शहर के आसपास मौजूद खेतों में भरे पानी और कुछ उथले तालाबों में ये बत्तख के प्रकार के पक्षी नजर आ रहे हैं। ये माइग्रेटरी बर्ड ज्यादा गहरे जलीय स्थानों में नहीं रहती। इनके पैर एक-दो इंच की पानी में रहना चाहिए।

हजारों किलोमीटर की यात्रा

पक्षी विशेषज्ञ और बर्ड वॉचर जगत फ्लोरा ने बताया कि ये पक्षी हजारों किलोमीटर दूर से चलकर आते हैं। लेकिन ये पक्षी इतनी लंबी यात्रा कैसे कर लेते हैं इस बारे में अभी तक कोई भी रिसर्च पता नहीं कर पाई है। पक्षी प्रेमियों के साथ वैज्ञानिकों के बीच भी यह बड़ी उत्सुकता का विषय हमेशा से रहा है लेकिन अभी तक इनकी यात्रा का रहस्य नहीं पता चल पाया है। कुछ लोग मानते हैं कि ये लैेंड मार्क पहचान लेते हैं तो कुछ का कहना है कि मैग्नेटिव वेव्स को पकड़कर चलते हैं। एक माह के सफर के बाद ये शहर पहुंच पाते हैं। चलते झुंड में हैं लेकिन फिर बिखर जाते हैं और जाते समय फिर झुंड में ही वापस लौटते हैं।