ग्वालियर। नईदुनिया प्रतिनिधि

सरकार ने स्व-सहायता समूहों को आंगनबाड़ियों के भोजन की जिम्मेदारी इसलिए दी कि समूह के सदस्यों को रोजगार मिले और बच्चों को बेहतर क्वालिटी का खाना। मकसद नेक था, लेकिन विभाग की आंखों के सामने ही सारे नियम रखे रह गए। हकीकत यह है कि बच्चों की डाइट सप्लाई में स्व-सहायता समूहों ने सिंडिकेट खड़ा कर दिया है। अब यह सिंडिकेट बच्चों की सेहत को नजरअंदाज कर भलेही घटिया खाने की सप्लाई करे, कोई रोकने और मॉनिटरिंग करने वाला नहीं है। जमीनी स्तर पर बदतर हालात होने के बाद नए सिरे से इस व्यवस्था को शुरू किए जाने की जरूरत है, लेकिन जिम्मेदार इसके लिए रुचि नहीं दिखाते।

जिले की 1458 आंगनबाड़ियों में भोजन सप्लाई का काम स्व-सहायता समूहों के जिम्मे है। शहरी क्षेत्र की 600 आंगनबाड़ियों तक में स्व-सहायता समूहों द्वारा दिए जाने वाले भोजन की क्या स्थिति है, यह नईदुनिया की पड़ताल के बाद अब किसी से छुपी नहीं रही। नईदुनिया पिछले दिनों लगातार शहर की अलग-अलग आंगनबाड़ियों में पड़ताल कर हकीकत सामने ला चुका है। बदबूदार दलिया-खिचड़ी तक बच्चों को परोसी जा रही है, इसकी भी कोई गारंटी नहीं कि यह बचा हुआ खाना बांटा जा रहा है या उसी दिन पकाया जा रहा है।

इनके हवाले 600 शहरी आंगनबाड़ी

-महाकाल स्व-सहायता समूह

-नानक स्व-सहायता समूह

-सोना स्व-सहायता समूह

-जय मां दुर्गे स्व-सहायता समूह

-स्व. सुशीला देवी महिला मंडल

ऐसे चलता है सिंडिकेट

जिले में शहर से लेकर देहात तक आंगनबाडियों में भोजन बांटने वाले स्व-सहायता समूहों ने सिंडिकेट बना रखा है। इनका आपस में तालमेल बेहद तगड़ा होता है और सिर्फ विभाग को दिखाने के लिए ही यह अलग-अलग समूह के रूप में काम करते हैं। एक-एक समूह पर ढेरों आंगनबाड़ियां हैं। ऐसा कभी नहीं होता कि एक स्व सहायता समूह की आंगनबाड़ी में बेहतर व्यवस्थाएं हों तो दूसरे की खराब। आंगनबाड़ियों में वितरण से लेकर खाने की क्वालिटी एक ही जैसी होती हैं, सभी समूह एक होकर चलते हैं। शिकायत या विभागीय किसी आपत्ति के समय यह समूह एक स्वर में बोलते हैं और पर्दे के पीछे एक-दूसरे की मदद भी करते हैं, जिससे इन समूहों पर कार्रवाई ही नहीं हो पाती।

प्रशासकीय व्यय से मार्जिन निकाल लेते हैं समूह

आंगनबाड़ियों में भोजन वितरण का काम स्व-सहायता समूहों को एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट के आधार पर दिया जाता है, जो 'नो प्रॉफिट-नो लॉस' के आधार होता है। इसमें प्रशासकीय व्यय की स्वीकृति शासन देता है, जिसके पीछे मकसद होता है कि भोजन और रोजगार देने के बाद भी कुछ खर्च की जरूरत होती है। अब इसी व्यय में से स्व सहायता समूह मार्जिन निकाल लेते हैं। आंगनबाड़ियों के रजिस्टर में दर्ज बच्चों के हिसाब से भुगतान लिया जाता है, लेकिन आधी संख्या में भी बच्चे आंगनबाड़ियों में आते नहीं, इस तरह भोजन बचा लिया जाता है।

शिकायत पर नहीं होती सुनवाई

आंगनबाड़ियों में घटिया खाने पर महिला एवं बाल विकास विभाग के अफसरों से शिकायत भी की जाती है,खुद अधिकारियों को अपने नेटवर्क से भी यह पुख्ता सूचना मिलतीं हैं कि खराब खाना बनाया गया है। वहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका की तो रोज आंखों के सामने घटिया भोजन आता है और वह यह तक बता चुकीं हैं कि हम अपने सुपरवाइजर को खराब खाने के बारे में बताते हैं तो हमें चुप रहने को कहा जाता है।

वर्जन आएगा