भितरवार। नईदुनिया प्रतिनिधि

युवक-युवतियां अच्छे कार्य व संस्कृति का विकास करें और कुछ अच्छी पहल करें। अच्छे ढंग से प्रत्येक कार्य करें, नए हुनर सीखें और अपने कार्य को बेहतर ढंग से करें तथा नैतिक मूल्यों को आत्मसात करें। वेतनवृद्घि और पदोन्नति की चिंता न करें, विवेकपूर्ण महत्वाकांक्षा रखें। प्रत्येक कार्य में अपना सर्वोत्तम योगदान दें और अपनी अपेक्षाएं पूरी करें। अपनी कंपनी के पदाधिकारियों के समक्ष अपनी उपयोगिता सिद्घ करें और अपना कौशल बढ़ाएं। जिससे वह बड़े-बड़े सपने देख सकें और उन्हें पूरा कर सकें। वह अपनी बात सहज, सरल, प्रभावी और स्पष्ट तरीके से व्यक्त करना सीखें। भाषा ज्ञान और अभिव्यक्ति कौशल के संवर्धन का सतत प्रयास करते रहें और सोचने की शक्ति विकसित करें। यह बात वार्ड 13 के चिंतामणि पार्श्वनाथ मंदिर में चातुर्मास व्रत कर रहे जैनमुनि संयम सागर महाराज ने शनिवार को धर्मसभा में प्रवचन देते हुए कही।

उन्होंने कहा कि अधिकांश युवक-युवतियां समस्याओं को हल करने में कुशल एवं सक्षम नहीं हैं। उन्हें बंधे-बंधाएं ढांचे से बाहर निकलकर सोचने का अभ्यास नहीं है। वे चीजों को नए तरीके से करने के बारे में नहीं सोचते हैं। यह आवश्यक है कि वे समस्याओं को हल करने और व्यवहारिक उपाय खोजने पर ध्यान दें। समस्याओं के हल के नए तरीकों की खोज करें, व्यवहारिक प्रयोग करें। उन्होंने कहा कि हमारे देश में जुगाड़ की विलक्षण प्रतिभा उपलब्ध है। अतः हमारे युवक-युवतियां समस्याओं के समाधान के अभिनव तरीके खोजें। हमारे सांस्कृतिक परिवेश में बड़ों को और बड़े पदों पर बैठे व्यक्तियों को अत्यधिक सम्मान दिया जाता है। अतः युवक-युवतियां बड़े व्यक्तियों की सीख से प्रभावित हो जाते हैं और बिना सोचे समझे ही उनके अविष्कार क्रियान्वयन करने लगते हैं। युवक-युवतियों से आग्रह है कि वह अपनी मौलिक कार्य संस्कृति को विकसित करें। सिरमौर बनने के लिए अच्छी कार्यशैली, संस्कृति विकसित करें और सहृदयता प्रदर्शित करने के अवसर ढूंढ़ते रहें। किसी की सहायता करने से पीछे न हटें और सहयात्री को देखकर मुस्कुराएं और उसे ठंडा पानी पिलाएं। हमारी हल्की सी मुस्कुराहट और मीठे बोल दूसरे की बड़ी सहायता करते हैं और उनकी शुभकामनाएं हमारे प्रगति के पथ को सुगम बनाती हैं।

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