श्योपुर-बड़ौदा। बड़ौदा तहसील का सिरसौद गांव जहां की आधी आबादी के लिए बरसात की सीजन यातनाएं लेकर आता है। कारण यह है कि, गांव के एक हिस्से को जोड़ने वाली सड़क बारिश के कारण चार से पांच महीने तक जलमग्न रहती है। सड़क पर चार से पांच फीट तक पानी भर जाता है। ऐसे में गांव में प्रसूताओं को 10 से 15 दिन पहले ही बाहर भेज दिया जाता है। कई प्रसूताएं अपने मायके या रिश्तेदार के यहां चली जाती हैं जिससे प्रसव पीड़ा उठने पर तत्काल बड़ौदा या श्योपुर अस्पताल पहुंच जाएं। इतना ही नहीं कई प्रसूताएं तो प्रसव से 10 दिन पहले ही अस्पताल में जाकर भर्ती हो जाती हैं।

उदाहरण ऐसे समझिए कि, सुशीला पत्नी राकेश बंजारा साढ़े आठ महीने की गर्भवती है। उसके प्रसव में डॉक्टरों ने 10 से 12 दिन का समय बताया है लेकिन, सुशीला के परिजनों ने उसे पांच दिन पहले बड़ौदा में रहने वाले अपने रिश्तेदार के यहां भेज दिया है। इसी तरह गर्भवती डाली बाई पत्नी रमेश बंजारा व तावड़ी पत्नी अमरलाल बंजारा को भी बड़ौदा में रहने वाले रिश्तेदार के यहां प्रसव से 10 से 15 दिन पहले ही भेज दिया है।

गांव की ही गुड्डी पत्नी नरेन्द्र कुमार केा बड़ौदा अस्पताल में गुुरुवार को भर्ती कराया गया है उसके प्रसव में भी डॉक्टरों ने तीन से चार दिन का समय बताया है। सिरसौद गांव में कोई बीमार हो जाए तो गांव के बाहर एंबुलेंस या निजी वाहन खड़ा हो जाता है। खटिया पर लेटाकर बीमार या घायल को यह रास्ता पार कराया जाता है।

720 में से 250 परिवार संकट में -

सिरसौद गांव में 720 परिवारों की आवादी है,लेकिन गांव के बीच से बह रही रातड़ी नदी के कारण एक हिस्से में बसे 250 परिवारों का संपर्क बारिश के कारण पूरे गांव से कट जाता है। नदी पर एक स्टॉप डैम बना है यह भरते ही गांव का रास्ता चार से पांच फीट तक पानी में डूब जाता है। स्टॉप डैम में पानी कम से कम दिसंबर महीने तक भरा रहता है।

छह जान ले चुका है पानी का उफान -

सिरसौद गांव की सड़क पर भरा रहने वाला यह पानी अब तक छह महिलाओं की जान ले चुका है। पानी को पार करते हुए चार महिलाएं इसमें डूबकर जान गंवा बैठी है। इनमें से तीन प्रसूताएं थी। करीब छह साल पहले एक बैलगाड़ी इस पानी के बहाव में बह गई। बैलगाड़ी में सवार पति-पत्नी और बैलों का शव दूसरे दिन मिला।

कंधे पर बैठाकर बच्चों को पहुंचाते हैं स्कूल -

सिरसौद गांव में प्राइमरी स्कूल है। गांव की सड़क जलमग्न होने के कारण कई दिन तक शिक्षक गांव में नहीं जाते। मिडिल व हाईस्कूल में जो बच्चे पढ़ते हैं उन्हें कंधों पर बैठाकर परिजन यह रास्ता पार कराते हैं। सुबह कंधे पर बैठाकर बच्चों को रास्ता पार कराया जाता है, शाम को उन्हें लेने के लिए भी ग्रामीण ऐसा ही करते हैं। पानी का बहाव रहता है इसलिए, महिलाएं हाथ पकड़कर रास्ते को पार करती हैं।

दो बार देख चुके कलेक्टर, किया कुछ नहीं -

सिरसौद गांव के बुजुर्गो का कहना है कि, यह समस्या दस-पांस साल की नहीं बल्कि कई दशकों पुरानी है। इसलिए कई परिवार गांव छोड़कर बड़ौदा या श्योपुर चले गए हैं। ग्रामीणों ने बताया कि अब तक कई बार नेताओं से लेकर अफसरों के सामने गुहार लगा चुके हैं। पूर्व कलेक्टर पन्नालाल सोलंकी तो दो बार बारिश के दिनों में आकर यहां के हाल देख चुके हैं। तब उन्होंने यहां रपटा बनाने की बात कही थी लेकिन, यह रपटा आज तक नहीं बना।

-सिरसौद गांव के लिए बारिश का सीजन आपदा भरा रहता है। गांव के एक हिस्से की सड़क पानी में कम से कम पांच महीने डूबी रहती है। इस रास्ते के कारण छह महिलाओं की मौत हो चुकी है। मजबूरी है इसीलिए प्रसूताओं को 10 से 15 दिन पहले अस्पताल या रिश्तेदार के यहां भेज देते हैं।

दारासिंह बंजारा, सिरसौद निवासी

-मेरी पत्नी गर्भवती है अभी प्रसव में आठ से 10 दिन का समय है लेकिन, गांव का रास्ता पानी में डूबा होने के कारण उसे गांव में रखना खतरनाक है। रात में प्रसव पीड़ा हुई तो कैसे अस्पताल ले जाएंगे इसलिए, उसे अभी से अस्पताल में भर्ती करा दिया है।

नरेन्द्र कुमार बंजारा, निवासी सिरसौद