Naidunia
    Saturday, February 24, 2018
    PreviousNext

    रानी रूपमति-बाज बहादुर के अमर-प्रेम का निशानी मकबरा हुआ खंडहर

    Published: Tue, 13 Feb 2018 06:18 PM (IST) | Updated: Wed, 14 Feb 2018 02:48 PM (IST)
    By: Editorial Team
    makbara 2018214 144022 13 02 2018

    सारंगपुर (प्रदीप जैन-अकरम अंसारी)। मोहब्बत, त्याग और स्मरपण की अमर व सच्ची प्रेम कहानी का प्रतीक सारंगपुर नगर में स्थित रानी रूपमति का मकबरा प्रेमियों को आकृषित तो करता ही है। साथ ही उनमें मोहब्बत के जज्बे को ऊर्जा की नई इबारत लिखते हुए प्यार की खातिर मर मिटने का जुनून पैदा करता है। यह मकबरा यहां बताने के लिए काफी है कि मोहब्बत दिल के मिलने से होती है वह जाति, धर्म और ऊंच नीच से कोसों दूर है।

    यह कहानी जुड़ी है मकबरे से

    ईस्वी सन्‌ 1556 से 1561 तक मालवा के सुल्तान रहे बाज बहादुर और सारंगपुर के पास स्थित शाजापुर जिले के तिंगजपुर गांव की गरीब परिवार में पली बड़ी रूपमति नाम की सहज और सुंदर कन्या की अद्भुत प्रेम कथा को सदियों तक याद किया जाएगा। बाज बहादुर ने अपनी रानी के लिए मांडू (धार) में जहाज महल बनवाया ताकि उसकी मेहबूबा को महल से ही नर्मदा नदी के दीदार हो जाए। रानी रूपमति से बाज बहादुर को इस कदर मोहब्बत थी कि रानी की कब्र पर बाज बहादुर ने अपनी आखिरी सांसें गिन कर दुनिया छोड़ी और उनकी कब्र को भी अपनी मेहबूबा के पास बनवाया। जब से लेकर अब तक सारंगपुरवासियों के लिए यहां मकबरा ताजमहल की तरह सच्चे प्रेम का प्रतीक बना हुआ है।

    यह है मकबरे का इतिहास

    रानी की मौत के बाद मालवा के सुल्तान बाज बहादुर ने रानी को सारंगपुर में दफनाया और वह उसकी कब्र की देख-रेख करता था। वर्ष 1568 में बाज बहादुर बीमार हो गया तो दिल्ली से पालकी से सारंगपुर पहुंचा। जहां रूपमति की मजार पर पहुंचकर वह सिर रखकर रोने लगा और वहीं अपने प्राण छोड़ दिए। इसके बाद बाज बहादुर को रूपमति की कब्र के पास दफनाया गया। रानी रूपमति की कब्र पर शहीदे वफा और बाज बहादुर की कब्र पर आशिके सादिक लिखा गया। दोनों की अमर प्रेम कहानी का साक्षी यह मकबरा किसी समय एक भव्य स्मारक था। जिला पुरातत्व संग्रहालय राजगढ़ द्वारा भी मकबरे की देखरेख वर्तमान में नहीं होना भी इसकी बदहाली दर्शाती है।

    मकबरे की नहीं हो रही देख-रेख

    इस मकबरे की पर्यटन विभाग अनदेखी कर रहा है। नवदुनिया टीम ने इसकी वर्तमान स्थित देखी तो पता चला कि मकबरा पूरी तरह से जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और उसकी देख-रेख के अभाव में स्मारक में पेड़-पौधे, घास एवं गंदगी का अंबार है। इसके अतिरिक्त इस सच्चे प्यार की निशानी स्थल पर आवारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता है।

    स्वच्छता अभियान बेहसर

    गौरतलब है कि देश में स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन इस मकबरे के पास फैली गंदगी को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे यहां पर सालों से साफ-सफाई नहीं हुई है। जबकि इसे धरोहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए जिम्मेदारों को ध्यान देना चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

    दीवारों पर नजर आते हैं प्रेमी-प्रेमिकाओं के नाम

    जीर्णशीर्ण अवस्था में मौजूद इस मकबरे की दीवारों पर सैकड़ों प्रेमी-प्रेमिकाओं ने अपने दिल का हाल उकेरा रखा है। इसकी दीवारों पर किसी ने अपने नाम के साथ पे्रमिका तो किसी प्रेमिका ने अपने प्रेमी का नाम कोयले या पेंट से लिख कर बाज बहादुर और रानी रूपमति के अमर प्रेम की तरह सच्चे प्रेम की कसमें खाई है।

    कोई मानता है प्यार के इजहार का दिन तो कई करते हैं इसका विरोध

    14 फरवरी यानि वेलेंटाइन-डे दुनिया भर में मोहब्बत की कदर करने वाले लोग मनाते हैं। मौसम के आंनद का आर्थिक दोहन करने के लिए इसका प्रचार बाजार और उसके प्रचार प्रबंधक करते हैं। भारतीय संस्कृति के समर्थक जहां इस वेलेंटाइन-डे को मनाने का विरोध तो करते हैं, लेकिन वे भी इस दिन को मित्र दिवस, मातृ पितृ दिवस या फिर शुभेच्छा दिवस मनाने की बात कर इसका प्रचार भी करते हैं। स्पष्टतः हमारे कथित संस्कृति समर्थक पश्चिम के पर्वों का विरोध तो करते हैं, लेकिन समाज पर वहां की विचारधारा के प्रभाव को समाज से पूरी तरह समाप्त करने में समर्थ नजर नहीं आते हैं। इसलिए दिन-प्रतिदिन वेलेंटाइन-डे जैसे पश्चिमी पर्वों का चलन देश में बढ़ रहा है और बड़े भी क्यूं नहीं जब प्यार करने वालों को विशेष दिल मिला है तो उसका आनंद लेना तो लाजमी है। समर्थन में कुछ युवा कहते है कि वेलेंटाइन-डे को पूरी तरह से नकारना गलत है क्योंकि वेलेंटाइन के बहाने अपने दिल की बात को दूसरे को बताने का सुनहरा मौका मिल जाता है।

    प्रतिक्रिया दें
    English Hindi Characters remaining


    या निम्न जानकारी पूर्ण करें
    नाम*
    ईमेल*
    Word Verification:*
    Please answer this simple math question.
    +=

      जरूर पढ़ें