वीरेन्द्र त्रिवेदी, सैलाना (रतलाम)। नईदुनिया न्यूज । वंश वृद्धि के लिए बारिश के खुशनुमा मौसम में क्षेत्र की घास-बीड़ों में दस्तक देने वाले दुर्लभ प्रवासी पक्षी खरमोर की बीते कुछ वर्षों में कमी आई है। इसका प्रमुख कारण विकास के नाम पर क्षेत्र में धड़ल्ले से लग रही पवन चक्कियां हैं। वर्ष 2017 में केवल चार खरमोर ने ही उपस्थिति दर्ज कराई। विश्व प्रवासी पक्षी दिवस पर सभी को ये संकल्प लेना होगा कि विकास भी हो और पक्षियों को उनका प्राकृतिक आवास भी मिले।

एक शताब्दी पहले तक खरमोर पूरे भारत में हिमालय से लेकर दक्षिण तट पर पाए जाते थे। घास के मैदानों में ही पाए जाने वाले खरमोर की संख्या अब धीरे-धीरे कम होने लगी है। 1980 के बाद तो लगभग विलुप्त से होने लगे खरमोर पर पक्षी विशेषज्ञों व सरकारों का ध्यान गया।

1983 में सैलाना में दिखा -

वर्ष 1980 से ही खरमोर की खोज में निकले प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सलीम अली को सैलाना में खरमोर नजर आए तो वे खुशी से उछल पड़े। बाद में डॉ. अली की अनुशंसा पर केंद्र व प्रदेश सरकारों ने खरमोर के संरक्षण की दिशा में बड़े कदम उठाए।

1983 में जारी की अधिसूचना -

15 जुलाई 1983 को राज्य शासन ने अधिसूचना जारी कर सैलाना, आम्बा और शेरपुर क्षेत्र में कुल 1296.541 हेक्टेयर भूमि खरमोर पक्षी के प्रवास के लिए अभयारण्य क्षेत्र घोषित किया। सैलाना अंतर्गत 355.570 हेक्टेयर क्षेत्र शिकारवाड़ी के नाम से जाना जाता है। उधर, केंद्र सरकार के केंद्रीय वन व पर्यावरण मंत्रालय ने खरमोर को संकटापन्ना घोषित किया।

कश्मीर की वादियों से आते हैं -

खरमोर पक्षी का आकार साधारण मुर्गी की तरह होता है। ये कश्मीर की वादियों से प्रजनन के लिए सैलाना आ जाते हैं। वर्षाकाल में इस क्षेत्र की आबोहवा इन्हें बेहद रास आती है प्रजनन के बाद जुलाई के सुहाने मौसम में इनका आगमन शुरू होता है और अक्टूबर अंत तक ये बच्चों समेत उड़ककर पुनः अपने घरों को लौट जाते हैं।

घंटों इंतजार करते हैं -

बरसात के दिनों में खरमोर की गतिविधियां देखने के लिए पक्षी प्रेमी घंटों दूरबीन लगाकर प्रतीक्षा करते हैं। घास-बीड़ में खरमोर की अठखेलियां देखकर खुशी से रोमांचित हो जाते हैं।

ऐसे आकर्षित करते हैं मादा को -

बेहद शांत और जरा-सी आहट से घास-बीड़ में छुप जाने वाला नर खरमोर मादा को आकर्षित करने के लिए तेज विशेष प्रकार की टर्र-टर्र की आवाज निकालता है और एक ही स्थान पर खड़े रहकर उछल-कूद करता है। उसकी आवाज और उछल-कूद की क्षमता मादा खरमोर को आकर्षित व प्रजनन के लिए आमंत्रित करती है। विभिन्ना शोधों से ये भी स्पष्ट हुआ है कि दो-तीन दिन अच्छी बारिश के बाद खरमोर की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी होती है। शर्मिले स्वभाव के कारण इन्हें दूर से ही देखा जा सकता है।

साल दर साल घट रही संख्या -

वर्ष खरमोर

2007 27

2008 38

2009 36

2010 24

2011 26

2012 33

2013 18

2014 16

2015 24

2016 12

2017 04

पवन चक्कियों ने रोकी राह -

बीते कुछ वर्षों से क्षेत्रों में पवन चक्कियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। जानकारों के अनुसार पवन चक्कियां दुर्लभ पक्षी खरमोर के आगमन की राह में रोड़े बन रही हैं। स्थित यह हो गई है कि अब केवल सीमित संख्या में ही खरमोर क्षेत्र में दस्तक दे रहे हैं। पवन चक्कियों की आवाज प्रवासी पक्षी को रास नहीं आ रही है। डिप्टी रेंजर सैलाना नारायण कटारा का कहना है कि संभवतः पवन चक्कियों की आवाज खरमोर को रास नहीं आ रही है। 2017 में केवल 4 खरमोर ही देखे गए। खरमोर का आहार कीड़े-मकोड़े, कीट-पतंगे हैं। ये फसलों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।

खरमोर बताओ-इनाम पाओ -

खरमोर के संरक्षण के लिए वन विभाग द्वारा इनाम भी दिया जाता है। इसके लिए आपके आसपास किसी क्षेत्र में खरमोर दिखाई देने पर तत्काल इसकी सूचना निकटतम वन कार्यालय पर देना है। सूचना के आधार पर वन विभाग इस सुंदर प्रवासी पक्षी के संरक्षण के लिए प्रयास करेगा। साथ ही सूचना सही पाए जाने पर 1000 से 5000 रुपए तक का इनाम दिया जाएगा। खरमोर को भटकुकड़ी और भटतीतर भी कहते हैं।