रीवा। नईदुनिया प्रतिनिधि

भारत में भी शोध कार्य को बढ़ावा देने के लिए कई जतन किए जाते रहे हैं, लेकिन आज भी देश में हो रहे शोध की न केवल मात्रा बल्कि उसकी गुणवत्ता को लेकर हम अन्य देशों की तुलना में काफी पिछड़े हुए हैं। यह बातें डॉ. सीएसएस ठाकुर आचार्य एवं विभागाध्यक्ष समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर ने टीआरएस कॉलेज के समाज शास्त्र विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में कहीं है। उन्होंने कहा कि आधुनिक भारत में शोध की परंपरा औपनिवेशिक काल में स्थापित विश्वविद्यालयों और संस्थानों में शुरू हुई, जो कमोबेश अविच्छिन्न रूप से अभी भी उसी ढर्रे पर चल रही है। कभी-कभी शोध की वरीयताओं को लेकर सोच-विचार जरूर किया गया है और कुछ बदलाव भी आए हैं परंतु शोध की संस्कृति ज्यादातर अध्ययन केंद्रों पर अपनी पुरानी लीक पर ही चलती चली जा रही है। थोड़े से ऐसे उच्च अध्ययन केंद्र, जो उत्कृष्टता के द्वीप कहे जा सकते हैं, अपवाद स्वरूप जरूर मिल जाएंगे परंतु अधिकांश शिक्षा केंद्रों पर शोध एक पिटी पिटाई कवायद की तरह होता है जिसमें एक क्रम में कुछ रिचुअल पूरे किए जाते हैं। इसीलिए प्रत्येक शिक्षक को हमेशा एक छात्र के भांति सोचना चाहिए एवं अपनी जिज्ञासा को बनाए रखना चाहिए।

इन्होंने भी रखी बात

डॉ. ध्रुव दीक्षित प्राध्यापक समाजशास्त्र केशरवानी महाविद्यालय जबलपुर ने सामाजिक अनुसंधान के विविध आयामों पर चिंतन प्रस्तुत किया। डॉ. एसपी शुक्ल प्राध्यापक राजनीति विज्ञान ने सामाजिक अनुसंधान की तकनीकों पर अपनी बात रखी। डॉ. अखिलेश शुक्ल ने शोध पत्र एवं शोध प्रबंध तैयार करने के चरणों पर शोध पत्र प्रस्तुत किया। शोधार्थी छात्र-छात्राओं द्वारा वक्ताओं से विभिन्न प्रश्न कर अपना समाधान किया। कार्यशाला के समापन अवसर पर डॉ. केके सिंह दुबे, डॉ. महानन्द द्विवेदी, डॉ. श्रीनिवास मिश्र, डॉ. महेन्द्रमणि द्विवेदी, डॉ. एचजीआर त्रिपाठी, डॉ. मधुलिका श्रीवास्तव डॉ. अनिल द्विवेदी, प्रो. निशा सिंह, प्रो. शिवबिहारी कुशवाहा, प्रो. प्रियंका तिवारी, अमित श्रीवास्तव आदि उपस्थित रहे।